जनवरी में तरबूज की खेती क्यों है फायदेमंद? जानिए सही किस्म, दूरी और बीज मात्रा

तरबूज की खेती के लिए रेतीली और रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. ऐसी मिट्टी में जल निकास अच्छा होता है, जिससे जड़ों को सड़न से बचाया जा सकता है. खेत की तैयारी करते समय सबसे पहले मिट्टी की अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 6 Jan, 2026 | 08:51 AM

Watermelon farming guide: गर्मियों के मौसम में अगर कोई फल सबसे ज्यादा राहत और मुनाफा दोनों देता है, तो वह है तरबूज. जायद सीजन की यह प्रमुख फसल आज किसानों के लिए कम समय में अच्छी कमाई का भरोसेमंद विकल्प बन चुकी है. तरबूज की खेती की खास बात यह है कि इसे कम खाद, कम पानी और सीमित देखभाल में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. यही वजह है कि मैदानी इलाकों से लेकर नदियों के पेटे और हल्की रेतीली जमीन तक, हर जगह इसकी खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है. सही समय पर खेत की तैयारी, उपयुक्त किस्मों का चयन और संतुलित बीज दर अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं.

तरबूज की खेती के लिए अनुकूल जलवायु

तरबूज मूल रूप से गर्म जलवायु की फसल है. इसे अधिक तापमान और खुली धूप पसंद होती है. जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे पौधों की बढ़वार और फलों का विकास भी तेज होता है. बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए लगभग 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है. हालांकि अत्यधिक नमी और लगातार आर्द्र वातावरण तरबूज के लिए नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि इससे पत्तियों में रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए सूखा और गर्म मौसम इसकी खेती के लिए सबसे बेहतर रहता है.

खेत और मिट्टी की तैयारी

तरबूज की खेती के लिए रेतीली और रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. ऐसी मिट्टी में जल निकास अच्छा होता है, जिससे जड़ों को सड़न से बचाया जा सकता है. खेत की तैयारी करते समय सबसे पहले मिट्टी की अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए. आमतौर पर 3 से 4 जुताई पर्याप्त होती हैं. भारी मिट्टी में ढेले तोड़कर जमीन को भुरभुरी बनाना जरूरी है, जबकि रेतीली भूमि में ज्यादा जुताई की जरूरत नहीं पड़ती.

खेत तैयार करते समय गोबर की सड़ी हुई खाद को अच्छी तरह मिट्टी में मिला देना चाहिए. यदि खेत में रेत की मात्रा अधिक हो, तो ऊपर की सतह हटाकर नीचे की मिट्टी में खाद मिलाना फायदेमंद रहता है. इस प्रक्रिया से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पीएच मान 5.5 से 7.0 के बीच बना रहता है, जो तरबूज के लिए आदर्श है. इसके बाद खेत में छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर बुवाई की तैयारी की जाती है.

उन्नत और संकर किस्मों का चयन

अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चयन बेहद जरूरी है. आज बाजार में कई उन्नत और संकर किस्में उपलब्ध हैं, जो स्वाद, आकार और उत्पादन के मामले में बेहतर परिणाम देती हैं. शुगर क्वीन, आस्था, मधुबाला, कैंडी, सागर किंग और एफ-1 मैक्स जैसी किस्में किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. ये किस्में जल्दी तैयार होती हैं और बाजार में अच्छा भाव भी दिलाती हैं.

बुवाई का सही समय और दूरी

तरबूज की बुवाई आमतौर पर नवंबर से मार्च के बीच की जाती है. नवंबर-दिसंबर में बोई गई फसल को पाले से बचाना जरूरी होता है, जबकि सबसे अधिक बुवाई जनवरी से मार्च की शुरुआत तक की जाती है. पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई मार्च-अप्रैल में की जाती है. बुवाई के समय कतार और पौधों के बीच उचित दूरी रखना जरूरी है. अधिक फैलने वाली किस्मों के लिए कतारों की दूरी लगभग 3 मीटर और पौधों की दूरी 1 मीटर रखी जाती है. कम फैलने वाली किस्मों में यह दूरी थोड़ी कम रखी जा सकती है.

बीज दर और बोने की विधि

बीज की मात्रा किस्म, मौसम और दूरी पर निर्भर करती है. आमतौर पर तरबूज की खेती के लिए 3 से 4 किलो बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. नवंबर-दिसंबर की बुवाई में बीज की मात्रा थोड़ी अधिक लगती है, जबकि फरवरी-मार्च में कम बीज की जरूरत पड़ती है. बीजों को हाथ से थामरों में बोना सबसे प्रचलित और सुरक्षित तरीका माना जाता है. एक थामरे में 3 से 4 बीज लगाए जाते हैं और बीज की गहराई 4 से 5 सेंटीमीटर से अधिक नहीं रखनी चाहिए.

अगर किसान तरबूज की खेती में खेत की सही तैयारी, उपयुक्त किस्मों का चयन और संतुलित बीज दर का ध्यान रखें, तो जायद मौसम में यह फसल कम लागत में अच्छा मुनाफा दे सकती है. सही तकनीक अपनाकर तरबूज न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ाता है, बल्कि गर्मियों में बाजार की मांग को भी पूरा करता है.

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