वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तकनीक, अब बढ़ेगा मिट्टी में कार्बन का स्तर..कम होगी खेती की लागत

बेंगलुरु के कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए कम लागत वाली बायोचार तकनीक विकसित की है, जो फसल अवशेषों को मिट्टी सुधारक में बदलती है. यह तकनीक मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने, उर्वरकों की प्रभावशीलता सुधारने और खेती की लागत कम करने में मददगार मानी जा रही है. इससे छोटे और सीमांत किसानों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 2 Jul, 2026 | 02:09 PM

किसानों की मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत कम करने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कम लागत वाली बायोचार (Biochar) तकनीक विकसित की है. इस तकनीक को बेंगलुरु स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (UAS) और गांधी कृषि विज्ञान केंद्र (GKVK) के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, बायोचार बनाने में किसी बाहरी रसायन या पूरक सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता. इसके लिए अरहर, मक्का और शहतूत के डंठल, सूरजमुखी के अवशेष तथा अन्य फसलों की छंटाई से निकले अवशेषों का इस्तेमाल किया जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने, जैविक कार्बन स्तर सुधारने और छोटे एवं सीमांत किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है.

यूएएस के कुलपति एस.वी. सुरेशा ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि कर्नाटक की आधे से अधिक कृषि भूमि में मिट्टी का जैविक कार्बन स्तर  आवश्यक सीमा से नीचे पहुंच गया है, जो चिंता का विषय है. उन्होंने कहा कि बायोचार तकनीक किसानों द्वारा जलाए जाने वाले फसल अवशेषों को मिट्टी की सेहत सुधारने वाले संसाधन में बदल देती है. वैज्ञानिकों ने बायोचार तैयार करने के लिए 25 किलोग्राम क्षमता वाला एक विशेष ड्रम विकसित किया है. इस ड्रम में छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं, जिससे सीमित मात्रा में ऑक्सीजन अंदर पहुंच सके. बायोचार बनाने के लिए फसल अवशेषों को ड्रम में भरकर ढक्कन बंद कर दिया जाता है और करीब तीन घंटे तक जलाया जाता है. इस प्रक्रिया के बाद बायोचार तैयार होता है.

कृषि भूमि में कम से कम 0.75 प्रतिशत कार्बन होना चाहिए

वैज्ञानिकों के अनुसार, एक किलोग्राम बायोचार में 500 से 800 ग्राम तक कार्बन (50 से 80 प्रतिशत) मौजूद होता है, जो मिट्टी की गुणवत्ता  सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक हेक्टेयर कृषि भूमि में कम से कम 0.75 प्रतिशत कार्बन होना चाहिए. लेकिन वर्तमान में कर्नाटक समेत देश के अधिकांश हिस्सों की कृषि भूमि में कार्बन की मात्रा केवल 0.33 से 0.50 प्रतिशत के बीच है. वहीं, वन क्षेत्रों के आसपास की मिट्टी में कार्बन की मात्रा 1 से 1.5 प्रतिशत तक पाई जाती है. ऐसे में बायोचार तकनीक मिट्टी में कार्बन बढ़ाने और उसकी उर्वरता सुधारने का प्रभावी विकल्प बन सकती है.

मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित

वैज्ञानिकों के अनुसार, कर्नाटक का कोलार जिला मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित है. जिले की 94 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि में मिट्टी का जैविक कार्बन (SOC) स्तर बहुत कम पाया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता, पशुधन की घटती संख्या, गोबर खाद की बढ़ती कीमत, लगातार एक ही फसल की खेती (मोनोक्रॉपिंग) और फसल अवशेषों को खुले में जलाने जैसी वजहों से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा तेजी से घट रही है.

60 प्रतिशत डीएपी होता है आयाता

वैज्ञानिकों ने कहा कि भारत उर्वरकों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. देश अपनी जरूरत का 20 से 25 प्रतिशत यूरिया, 50 से 60 प्रतिशत डीएपी (DAP) और लगभग 100 प्रतिशत म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) आयात करता है. यदि इन उर्वरकों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, जैसे प्राकृतिक गैस, रॉक फॉस्फेट और सल्फर के आयात को भी शामिल किया जाए, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भारत की निर्भरता 68 से 70 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बायोचार जैसी तकनीकें मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में भी मदद कर सकती हैं.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 2 Jul, 2026 | 02:09 PM

लेटेस्ट न्यूज़