ऑस्ट्रेलिया की अदालत के फैसले से भारत के बासमती चावल निर्यातकों को झटका लगा है. अब ऑस्ट्रेलियाई बाजार में भारतीय बासमती को पाकिस्तानी बासमती से सीधी टक्कर लेनी होगी. दरअसल, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने ऑस्ट्रेलिया में ‘बासमती’ को सर्टिफिकेशन ट्रेडमार्क के तौर पर मान्यता देने की मांग की थी. APEDA का तर्क था कि भारत में पैदा होने वाले बासमती चावल को GI टैग मिला हुआ है. हालांकि, ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा में GI से जुड़ी मान्यता केवल ‘शैम्पेन’ के मामले में सीमित है.
APEDA ने पहली बार 2019 में ट्रेडमार्क के लिए आवेदन किया था. प्राधिकरण ने ऑस्ट्रेलियाई बाजार में भारतीय बासमती की मजबूत मौजूदगी का हवाला दिया था. आंकड़ों के मुताबिक, 1988 से अगस्त 2018 के बीच ऑस्ट्रेलिया के रिटेल बाजार में करीब 3,06,095 टन भारतीय बासमती बिका, जिसकी कीमत लगभग 38 करोड़ डॉलर थी. वहीं, इस दौरान पाकिस्तान की बासमती बिक्री करीब 4.41 करोड़ डॉलर रही.
पाकिस्तान में भी होती है बासमती की खेती
ऑस्ट्रेलिया के ट्रेडमार्क कार्यालय ने जनवरी 2023 में APEDA की ‘बासमती’ ट्रेडमार्क की मांग खारिज कर दी थी. उसका कहना था कि पाकिस्तान में भी बासमती की खेती होती है, इसलिए भारत को इसका अकेला उत्पादक नहीं माना जा सकता. इसके बाद APEDA ने इस फैसले को ऑस्ट्रेलियाई फेडरल कोर्ट में चुनौती दी और मामले की नए सिरे से सुनवाई की मांग की. हालांकि, अदालत ने अब APEDA की अपील खारिज कर दी है. पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय ने इस फैसले का स्वागत किया है.
ईरान रूट की अनिश्चितता के बीच नए बाजार तलाश रहे निर्यातक
भारत और पाकिस्तान दोनों ऑस्ट्रेलिया को बड़ी मात्रा में प्रीमियम चावल का निर्यात करते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 से मई 2026 के बीच भारत ने ऑस्ट्रेलिया को करीब 72,500 टन चावल निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 735 करोड़ रुपये थी. वहीं, ऑस्ट्रेलिया के फैसले से पंजाब और हरियाणा के बासमती निर्यातकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है. दोनों राज्यों के निर्यातक ईरान के रास्ते शिपमेंट को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच दूसरे विदेशी बाजारों में पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
बासमती की भारतीय पहचान मजबूत करने पर जोर
बासमती एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रंजीत सिंह जोसन ने हिन्दुस्तान टाइम्स से कहा कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत का फैसला निश्चित रूप से चुनौती है, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी बासमती किसानों के हितों और अधिकारों की रक्षा करना है. उन्होंने कहा कि बासमती किसानों की पीढ़ियों की मेहनत से बनी भारत की कृषि विरासत है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘भारतीय मूल की बासमती’ की पहचान मजबूत करने के लिए गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी, असलियत और सही ब्रांडिंग पर ध्यान देना होगा. मिलर्स और निर्यातकों को भी भारत की बासमती की पहचान बचाने और बढ़ावा देने में भूमिका निभानी होगी.
पाकिस्तानी निर्यातकों से बढ़ेगा मुकाबला
बासमती निर्यातकों ने कहा है कि वे APEDA के साथ मिलकर सर्टिफिकेशन, ब्रांडिंग और बाजार में सुरक्षा से जुड़े कदमों को मजबूत करने के लिए काम करेंगे. इसका मकसद बासमती किसानों को बेहतर कीमत दिलाना और उनका भविष्य सुरक्षित करना है. एक निर्यातक ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के फैसले के बाद वहां भारतीय निर्यातकों को बासमती पर विशेष अधिकार नहीं रहेगा. अब भारतीय निर्यातकों को ऑस्ट्रेलियाई बाजार में पाकिस्तानी निर्यातकों से सीधा मुकाबला करना होगा. भारत हर साल करीब 60,000 करोड़ रुपये का बासमती चावल निर्यात करता है. इससे पहले भी भारत को न्यूजीलैंड और केन्या में बासमती को विशेष पहचान दिलाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. वहीं, यूरोपीय संघ में बासमती को मान्यता देने का भारत का आवेदन जुलाई 2018 से लंबित है.