जब भी गुड़ की बात होती है तो लोगों के जहन में सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर का नाम उभरकर सामने आता है, क्योंकि एशिया की सबसे बड़ी मंडी यहीं पर है. लोगों को लगता है कि भारत में सबसे बेहतरीन क्वालिटी के गुड़ यहीं पर बनाए जाते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं है. महाराष्ट्र के कोल्हापुर गुड़ का भी कोई जवाब नहीं है. यह अपनी मिठास के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. यही वजह है कि इसकी डिमांड केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों तक में है.
कोल्हापुर का गुड़ अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और प्राकृतिक सुनहरे-लाल रंग के लिए जाना जाता है. यह पूरी तरह पारंपरिक तरीके से और बिना किसी रसायन के बनाया जाता है. इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी मिला हुआ है. यह गुड़ महाराष्ट्र के कोल्हापुर क्षेत्र में पंचगंगा नदी के पोषक जल से उगाए गए गन्ने से तैयार किया जाता है, जिसकी वजह से इसका स्वाद और गुणवत्ता खास मानी जाती है. कोल्हापुरी गुड़ अपनी प्राकृतिक शुद्धता और पारंपरिक तरीके से बनने के लिए जाना जाता है. इसमें किसी भी तरह के रसायन का उपयोग नहीं किया जाता है, जिससे यह पूरी तरह से नेचुरल रहता है.
कोल्हापुर के गुड़ में पाए जाते हैं कई विटामिन
कोल्हापुर के गुड़ में आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम और विटामिन A, B व C जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो पाचन सुधारने और शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाने में मदद करते हैं. कोल्हापुरी गुड़ अपनी शुद्धता के कारण चाय, कॉफी और मिठाइयों में चीनी के बेहतर और स्वस्थ विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. यह न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी ज्यादा फायदेमंद माना जाता है.
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जिले में 1250 गुड़ उत्पादन इकाइयां
कोल्हापुर गुड़ सिर्फ स्वाद में ही नहीं बल्कि अपने अलग-अलग आकारों के लिए भी जाना जाता है, जिससे यह देखने में भी आकर्षक लगता है. कोल्हापुर में करीब 1250 गुड़ उत्पादन इकाइयां हैं, जहां यह गुड़ बड़े पैमाने पर बनाया जाता है. कोल्हापुर गुड़ की गुणवत्ता की मांग भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में है. इसे यूरोप, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भी निर्यात किया जाता है. बेहतर परिवहन सुविधाओं के कारण यह देश के हर हिस्से में आसानी से पहुंचता है और लोग इसे बड़े चाव से इस्तेमाल करते हैं.
यहां का गन्ना चीनी से भरपूर होता है
दरअसल, कोल्हापुर की उपजाऊ जमीन में उगाया जाने वाला गन्ना चीनी से भरपूर होता है और इसमें अन्य इलाकों की तुलना में अशुद्धियां बहुत कम होती हैं. इसी वजह से गुड़ बनाते समय इसे आसानी से साफ करके बेहतर गुणवत्ता वाला गुड़ तैयार किया जाता है. यहां के पारंपरिक कारीगर गुड़ को जरूरत के अनुसार हल्के लाल-भूरे रंग में तैयार करने में माहिर होते हैं. इस तरह बना हल्का रंग और मीठा स्वाद वाला गुड़ बहुत लोकप्रिय है. गुड़ बनाने की जगह को स्थानीय भाषा में ‘गुरहला’ कहा जाता है. इन गुरहलों में भोजन करने की भी परंपरा होती है, जहां खास तौर पर कोल्हापुरी मटन और रस्सा परोसा जाता है, जो इस क्षेत्र की खास पहचान मानी जाती है.
कब से किसान बना रहे हैं स्पेशल गुड़
महाराष्ट्र के कोल्हापुर क्षेत्र में 18वीं सदी से ही उच्च गुणवत्ता वाला गुड़ बनाया जाता रहा है. 1886 में छत्रपति शाहू महाराज ने इस क्षेत्र में गुड़ के लिए पहला मंडी यार्ड स्थापित किया था, जिसे आज भी इसी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है. यहां की पांच नदियां सह्याद्रि पर्वतों से निकलकर पंचगंगा नदी बनाती हैं, जो मिट्टी में खनिज तत्वों की मात्रा बढ़ाती हैं. इसी वजह से यहां उगने वाला गन्ना अधिक पौष्टिक होता है और उससे बनने वाला गुड़ भारत के सबसे पौष्टिक गुड़ों में गिना जाता है, जिसमें कई स्वास्थ्य लाभ भी पाए जाते हैं. कोल्हापुर के गन्ना किसान स्थानीय अर्थव्यवस्था में लगभग 13 अरब रुपये का योगदान देते हैं.
कब मिला GI Tag का दर्जा
कोल्हापुर में लगभग 1.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है. इस क्षेत्र में गन्ने की औसत पैदावार काफी अधिक होती है, जो करीब 80 से 120 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंचती है. यह जिला राज्य के कुल चीनी उत्पादन में बड़ा योगदान देता है. यहां कृषि क्षेत्र में गन्ने की खेती और चीनी मिलों का महत्वपूर्ण स्थान है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है. ऐसे कोल्हापुर के प्रसिद्ध गुड़ को 31 मार्च 2014 को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) का दर्जा दिया गया था. यह टैग इसकी खास पहचान और गुणवत्ता को आधिकारिक रूप से प्रमाणित करता है.
खबर से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
- 31 मार्च 2014 को मिला GI Tag का दर्जा
- 1.90 लाख हेक्टेयर में होती है गन्ने की खेती
- 120 टन प्रति हेक्टेयर है उत्पादन
- 1886 में छत्रपति शाहू महाराज ने पहला गुड़ मंडी बनवाई
- गन्ना किसान स्थानीय अर्थव्यवस्था में लगभग 13 अरब का योगदान देते हैं
- 18वीं सदी से किसान बना रहे हैं गुड़