कम लागत में करनी है बंपर कमाई तो करें स्ट्रॉबेरी की इन किस्मों की खेती.. विदेशों तक में है भारी डिमांड

महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी को 2010 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला, जो इसके अनोखे स्वाद और लाल मिट्टी के कारण दिया गया. महाबलेश्वर, जिसे भारत की ‘स्ट्रॉबेरी राजधानी’ कहा जाता है, देश के कुल स्ट्रॉबेरी उत्पादन में लगभग 85 फीसदी से अधिक का योगदान देता है.

नोएडा | Updated On: 25 Jan, 2026 | 02:17 PM

Mahabaleshwar Strawberry Farming: अब किसान पारंपरिक फासलों के साथ-साथ बागवानी भी कर रहे हैं. इससे उन्हें अच्छी कमाई हो रही है. खास बात यह है कि उत्तर भारत में जहां किसान हरी सब्जियों की ज्यादा खेती कर रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र में किसान स्ट्रॉबेरी की खेती में ज्यादा रूचि ले रहे  हैं. खास बात यह है कि स्ट्रॉबेरी की खेती को राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार भी बढ़ावा दे रही है. इसके लिए किसानों को सब्सिडी दी जा रही है. हालांकि, ऐसे तो पूरे महाराष्ट्र में किसान स्ट्रॉबेरी की खेती करते हैं, लेकिन महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी की बात ही अलग है. इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है. इसके चलते इसकी मांग राज्य से बाहर भी हो रही है. तो आइए आज जानते हैं, महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी की खासियत के बारे में.

महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी अपने खास स्वाद, सुगंध और रसीलेपन के लिए बहुत प्रसिद्ध है. यह भारत में उत्पादित स्ट्रॉबेरी का लगभग 85 फीसदी हिस्सा देती है. यहां की ठंडी जलवायु, लाल मिट्टी और विशेष खेती तकनीक इसे खास बनाती हैं और इसे GI टैग भी मिला हुआ है. ये स्ट्रॉबेरी ताजी रहती है और पर्यटक सीधे खेत से तोड़कर इसे खाने का अनुभव ले सकते हैं.

कब मिला जीआई टैग का दर्जा

अखिल भारतीय स्ट्रॉबेरी उत्पादक संघ ने साल 2009 में महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी  को भौगोलिक संकेत (GI) अधिनियम, 1999 के तहत पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क कार्यालय, चेन्नई में पंजीकृत कराने का प्रस्ताव दिया. इसके एक साल बाद, 2010 में इस फल को GI दर्जा मिल गया. महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी का निर्यात बड़े पैमाने पर फ्रांस, बेल्जियम, मलेशिया और मध्य पूर्व जैसे देशों में किया जाता है. इसके पहले, फल को जमा कर के तैयार किया जाता है.

30,000 मीट्रिक टन स्ट्रॉबेरी का उत्पादन

महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी को 2010 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला, जो इसके अनोखे स्वाद और लाल मिट्टी के कारण दिया गया. महाबलेश्वर, जिसे भारत की ‘स्ट्रॉबेरी राजधानी’ कहा जाता है, देश के कुल स्ट्रॉबेरी उत्पादन में लगभग 85 फीसदी से अधिक का योगदान देता है. साल 2015 के अंत तक यहां लगभग 3,000 एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती होती थी और सालाना करीब 30,000 मीट्रिक टन स्ट्रॉबेरी का उत्पादन होता है.

खास जलवायु खेती के लिए है अनुकूल

स्ट्रॉबेरी के लिए महाबलेश्वर की खास जलवायु और लाल मिट्टी बहुत अनुकूल हैं. ये फल ताजा, रसीले और थोड़ी सख्त बनावट के होते हैं, जिससे जल्दी खराब नहीं होते. यहां मुख्य रूप से स्वीट चार्ली, कामरोसा और विंटर डाउन जैसी किस्में उगाई जाती हैं. स्ट्रॉबेरी का मुख्य सीजन अक्टूबर-नवंबर से अप्रैल-मई तक होता है. ये ताजा खाने के साथ-साथ जैम, जेली, जूस, शेक और क्रीम के रूप में भी बेहद लोकप्रिय हैं.

महाबलेश्वर एक खूबसूरत हिल स्टेशन है

बता दें कि महाबलेश्वर सतारा जिले में बसा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है, जो अपनी शानदार प्राकृतिक खूबसूरती  और लाजवाब खाने के लिए जाना जाता है. खासकर स्ट्रॉबेरी सीजन में यह जगह रंग-बिरंगे स्वादों और यादगार अनुभवों से भर जाती है. प्रकृति प्रेमियों और खाने के शौकीनों, दोनों के लिए महाबलेश्वर एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है. ऐसे महाबलेश्वर में स्ट्रॉबेरी का सीजन दिसंबर से फरवरी तक रहता है और यही समय होता है जब यह जगह सबसे ज्यादा खिल उठती है. चारों ओर पकी हुई स्ट्रॉबेरी की मीठी खुशबू फैल जाती है और खेत लाल-लाल फलों से भर जाते हैं.

मिठाइयां और आइसक्रीम में होता है इस्तेमाल

स्ट्रॉबेरी यहां के खाने में खास जगह रखती है. चाहे मिठाइयां हों, आइसक्रीम हो या ठंडे ड्रिंक्स. पर्यटक स्थानीय खेतों में जाकर खुद स्ट्रॉबेरी तोड़ने का मजा भी ले सकते हैं और ताजे फल का स्वाद सीधे पौधे से ले सकते हैं. इस दौरान कई फार्म में स्ट्रॉबेरी से बने खास व्यंजन, कुकिंग वर्कशॉप और लाइव म्यूजिक जैसे आयोजन भी होते हैं, जो माहौल को और भी उत्सव जैसा बना देते हैं. यह समय परिवार और दोस्तों के साथ महाबलेश्वर के स्वाद और खुशियों का आनंद लेने के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. यही वजह है कि महाराष्ट्र सरकार महाबलेश्वर को एग्री टूरिज्म के रूप में बढ़ावा दे रही है.

क्या होता है जीआई टैग

GI मतलब जियोग्राफिकल इंडिकेशन होता है, जो एक एक खास पहचान वाला लेबल होता है. यह किसी चीज को उसके इलाके से जोड़ता है. आसान भाषा में कहें तो ये GI टैग बताता है कि कोई प्रोडक्ट खास तौर पर किसी एक तय जगह से आता है और वही उसकी असली पहचान  है. भारत में साल 1999 में ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट’ लागू हुआ था. इसके तहत किसी राज्य या इलाके के खास प्रोडक्ट को कानूनी मान्यता दी जाती है. जब किसी प्रोडक्ट की पहचान और उसकी मांग देश-विदेश में बढ़ने लगती है, तो GI टैग के जरिए उसे आधिकारिक दर्जा मिल जाता है. इससे उसकी असली पहचान बनी रहती है और वह नकली प्रोडक्ट्स से सुरक्षित रहता है.

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Published: 25 Jan, 2026 | 02:13 PM

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