Wheat Farming: मौसम में तेजी से बदलाव आ रहा है. सुबह- शाम हल्की ठंड रहती है, तो दोपर में तेज धूप निकल जाती है. इससे तापमान में अचानक बढ़ोतरी हो रही है. ऐसे में मौसम में अचानक बदलाव आने से गेहूं की फसल पर असर पड़ रहा है. खासकर तापमान और नमी में उतार-चढ़ाव के कारण कई इलाकों में गेहूं की बालियां समय से पहले काली पड़ने लगी हैं. किसान इसे देखकर चिंतित हैं, क्योंकि यह रंग बदलना किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. इससे पैदावार में गिरावट आने की भी संभावना बन रही है. लेकिन किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है. आज हम कुछ ऐसे टिप्स बताने जा रहे हैं, जिसे अपनाकर किसान गेहूं की फसल को बढ़ते तापमान से बचा सकते हैं.
दरअसल, काली पड़ती बालियां दानों के विकास को प्रभावित करती हैं और उत्पादन घटता है. साथ ही अनाज की गुणवत्ता भी कम होती है, जिसका असर सीधे बाजार भाव पर पड़ता है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि नुकसान से बचने के लिए किसानों को समय रहते कारण समझकर सही कदम उठाना चाहिए.
दानों का कुछ हिस्सा काला होकर बदबू देने लगता है
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के मुताबिक, गेहूं की बालियों का काला पड़ना मुख्य रूप से फफूंदजनित रोगों के कारण होता है, जैसे करनाल बंट और अनावृत कंडुआ. अनावृत कंडुआ में पूरी बाली काले पाउडर में बदल जाती है, जबकि करनाल बंट में दानों का कुछ हिस्सा काला होकर बदबू देने लगता है. दोनों ही मामलों में फसल का उत्पादन प्रभावित होता है.
रोग से फसल को बचाने के लिए करें ये काम
अगर खेत में बालियां काले पाउडर जैसी दिखें, तो उन्हें तुरंत अलग करके नष्ट कर दें. ध्यान रखें कि संक्रमित हिस्सा हवा में न फैले, नहीं तो बीमारी पूरे खेत में फैल सकती है. साथ ही रोग को रोकने के लिए समय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव जरूरी है. विशेषज्ञ सलाह के मुताबिक, प्रोपिकोनाजोल, टेबुकोनाजोल या कार्बेंडाजिम का संतुलित उपयोग फायदेमंद हो सकता है. भविष्य में इस रोग से बचाव के लिए बीज उपचार, फसल चक्र और खेत की सफाई अपनाएं. प्रभावित खेत के बीज दोबारा न उपयोग करें और बीच-बीच में दलहनी फसल उगाएं, ताकि मिट्टी स्वस्थ रहे और रोग का खतरा कम हो.
करनाल बंट से गेहूं की फसल को नुकसान
बता दें कि करनाल बंट गेहूं की एक प्रमुख फफूंदजनित बीमारी है, जो दानों को काला कर देती है और सड़ी मछली जैसी गंध पैदा करती है. यह रोग मुख्य रूप से बीज और मिट्टी से फैलता है और बालियों में दाना भरते समय नम मौसम में तेजी से फैलता है. इससे फसल की उपज में 40 फीसदी तक की कमी आ सकती है.