Kerala News: केरल के कृषि मंत्री पी प्रसाद ने कहा कि राज्य सरकार केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा दिए गए सुझावों को पूरी तरह खारिज करती है, जिसमें केरल को धान की खेती के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन बंद करने और इसकी समीक्षा करने के लिए कहा गया था. मंत्री ने पत्रकारों से कहा कि इस पत्र में दिए गए निर्देश स्वीकार्य नहीं हैं और केरल धान की खेती पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा. उन्होंने कहा कि धान की खेती राज्य की खाद्य सुरक्षा नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रसाद ने स्पष्ट किया कि मैं इस पत्र में दिए गए सुझावों को पूरी तरह खारिज करता हूं और औपचारिक रूप से विरोध दर्ज करता हूं. उन्होंने कहा कि धान की खेती को प्रोत्साहित न करने की कोई भी कोशिश किसानों और राज्य की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक असर डालेगी. यह विवाद 9 जनवरी, 2026 के एक पत्र से शुरू हुआ, जो वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के सचिव ने केरल के मुख्य सचिव डॉ. ए. जयतिलक को लिखा था. इसमें केंद्र सरकार ने बताया कि हाल के वर्षों में धान और गेहूं की भारी पैदावार के कारण खाद्यान्न का भंडार स्टॉक मानकों और कल्याण आवश्यकताओं से काफी ज्यादा हो गया है. इससे खरीद, भंडारण और हैंडलिंग खर्च बढ़ने के कारण सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है.
बोनस से अतिरिक्त भंडार बढ़ सकता है
केंद्र की चिट्ठी में चेतावनी दी गई थी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के ऊपर दिए जाने वाले राज्य-स्तरीय बोनस से अतिरिक्त भंडार बढ़ सकता है और राज्य पर सब्सिडी का दबाव बढ़ सकता है. केरल के कृषि मंत्री पी. प्रसाद ने सवाल किया कि कृषि बोनस कैसे बोझ बन सकता है और केंद्र की इस सोच पर आपत्ति जताई. इसके अलावा, खर्च विभाग ने धान और गेहूं की खेती को पर्यावरण और सतत विकास के लिहाज से चुनौतीपूर्ण बताया. ये फसलें पानी और उर्वरक ज्यादा लेती हैं और लंबे समय में मिट्टी की सेहत, भूजल स्तर और जलवायु सहनशीलता पर असर डालती हैं.
दालों और खाने के तेल अभी भी आयात पर निर्भर है
केंद्र ने यह भी बताया कि भारत अभी भी दालों और खाने के तेल के आयात पर निर्भर है और राज्यों से कहा कि वे धीरे-धीरे प्रोत्साहन दालों, तिलहन और मिलेट की ओर बढ़ाएं ताकि पोषण सुरक्षा बेहतर हो और आयात पर निर्भरता कम हो. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, केरल वर्तमान में अपनी कुल चावल की जरूरत का करीब 21 प्रतिशत उत्पादन कर रहा है, और राज्य की नीति इसे आने वाले वर्षों में 30 प्रतिशत तक बढ़ाने की है. अधिकारियों का कहना है कि इस समय धान बोनस जैसी प्रोत्साहन योजनाओं को रोकना या हतोत्साहित करना केरल की आत्मनिर्भरता की योजना में बाधा डालेगा. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अब बोनस हटा दिया गया, तो किसानों का विश्वास कम होगा और चावल की खेती में तेज गिरावट आएगी, जिससे राज्य की खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा और हालिया उत्पादन में हुई बढ़ोतरी उलट सकती है.