Apple import policy: भारत सरकार ने सेब की खेती करने वाले किसानों को राहत देने के लिए एक अहम कदम उठाया है. यूरोपीय संघ (EU) से आने वाले सेब पर अब न सिर्फ आयात की मात्रा तय की जाएगी, बल्कि न्यूनतम आयात मूल्य और शुल्क भी लागू रहेगा. सरकार का कहना है कि इस फैसले का मकसद विदेशी सेब के दबाव से घरेलू सेब उत्पादकों को बचाना और किसानों की आमदनी को सुरक्षित रखना है.
यूरोपीय सेब पर क्या-क्या शर्तें लगाई गईं
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सरकार ने साफ किया है कि यूरोपीय संघ के देशों से आने वाले सेब अब कम से कम 80 रुपये प्रति किलो की न्यूनतम आयात कीमत पर ही भारत में प्रवेश कर सकेंगे. इसके साथ ही इन सेबों पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क भी लगेगा, जो पहले 50 प्रतिशत था. यानी शुल्क में थोड़ी राहत जरूर दी गई है, लेकिन कीमत को लेकर सख्त शर्त रखी गई है ताकि सस्ते विदेशी सेब भारतीय बाजार में बाढ़ न ला सकें.
इसके अलावा आयात की मात्रा पर भी सीमा तय की गई है. शुरुआत में यूरोपीय देशों से अधिकतम 50 हजार टन सेब ही आयात किए जा सकेंगे. यह सीमा धीरे-धीरे अगले 10 वर्षों में बढ़ाकर 1 लाख टन की जाएगी.
क्यों जरूरी था यह कदम
भारत में सेब की खेती मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में होती है. हाल के वर्षों में ईरान, तुर्की और अफगानिस्तान से बड़ी मात्रा में सस्ते सेब आने लगे थे, जिससे घरेलू बाजार में दाम गिरने लगे. इससे स्थानीय बागवानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में भारत ने करीब 5 लाख टन सेब आयात किए थे. इनमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी ईरान की रही, इसके बाद तुर्की और अफगानिस्तान का नंबर आता है. यूरोपीय देशों से आने वाला सेब कुल आयात का करीब 11 प्रतिशत ही रहा, लेकिन वह प्रीमियम क्वालिटी का होता है और बड़े शहरों में उसकी अच्छी मांग रहती है.
किसानों की आमदनी को कैसे मिलेगी सुरक्षा
सरकार का कहना है कि न्यूनतम आयात मूल्य और 20 प्रतिशत शुल्क मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि यूरोपीय सेब की प्रभावी कीमत करीब 96 रुपये प्रति किलो से कम न हो. इससे भारतीय सेब के दाम बहुत नीचे नहीं जाएंगे और किसानों को अपनी फसल का वाजिब मूल्य मिल सकेगा.
सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, आयात को कोटे के दायरे में रखने से कुल सेब आयात में अचानक कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं होगी. ज्यादा संभावना यही है कि यूरोपीय सेब अन्य देशों से आने वाले सेब की जगह लेंगे, न कि कुल आयात को बहुत ज्यादा बढ़ाएंगे.
भारतीय सेब को भी मिलेगा यूरोप का रास्ता
इस समझौते का एक अहम पहलू यह भी है कि आने वाले 5 से 7 वर्षों में जब भारतीय सेब यूरोपीय संघ के देशों में जाएंगे, तो उन पर शून्य शुल्क लगेगा. इससे भारतीय सेब उत्पादकों के लिए एक नया और प्रीमियम बाजार खुलेगा.
सरकार का मानना है कि इससे भारतीय बागवानों को बेहतर कीमत मिलने का मौका मिलेगा और वे गुणवत्ता सुधार पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे. खासतौर पर हाई-ग्रेड और ऑर्गेनिक सेब यूरोप के बाजार में अच्छी पहचान बना सकते हैं.
संतुलन बनाने की कोशिश
सरकार का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह संतुलन पर आधारित है. एक तरफ घरेलू किसानों को सुरक्षा दी गई है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के तहत सीमित और नियंत्रित बाजार पहुंच भी दी गई है. कोटा, न्यूनतम कीमत और शुल्क तीनों मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि भारतीय किसानों को नुकसान न हो.
आने वाले समय में इस फैसले का असर सेब के बाजार में साफ दिख सकता है. अगर आयात नियंत्रित रहा और भारतीय सेब को यूरोप में जगह मिली, तो इससे बागवानी क्षेत्र को नई दिशा मिल सकती है. हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके साथ-साथ भंडारण, कोल्ड चेन और मार्केटिंग ढांचे को भी मजबूत करना जरूरी होगा.