भारत में धान की भूसी (Rice Bran) से निकले तेल रहित चोकर (De-oiled Rice Bran – DORB) का इस्तेमाल मुख्य रूप से पशु और पोल्ट्री फीड में किया जाता है. लेकिन पिछले दो साल से इस पर निर्यात प्रतिबंध लगा हुआ है. अब सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने सरकार से आग्रह किया है कि इस प्रतिबंध को 30 सितंबर 2025 के बाद और न बढ़ाया जाए.
भारत पहले था बड़ा सप्लायर
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, बैन से पहले भारत हर साल करीब 5–6 लाख टन DORB वियतनाम, थाईलैंड और अन्य एशियाई देशों को निर्यात करता था. इसकी कीमत करीब 1,000 करोड़ रुपये सालाना होती थी. इस वजह से भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक भरोसेमंद सप्लायर माना जाता था.
कीमतें आधी हो चुकीं
सरकार ने यह बैन जुलाई 2023 में इसलिए लगाया था ताकि देश में पशु आहार सस्ता मिले और दूध की कीमतें स्थिर रहें. उस समय DORB की कीमत 20,000 रुपये प्रति टन थी.
आज हालत यह है कि कीमत घटकर 10,000-11,000 रुपये प्रति टन रह गई है और आगे और गिरने की संभावना है. यही हाल अन्य प्रोटीन मील्स का भी है.
- सरसों/रेपसीड डी-ऑयल्ड केक जुलाई 2023 में 28,000 रुपये/टन था, अब 15,000 रुपये/टन रह गया है.
- सोयाबीन मील 46,000 रुपये/टन से गिरकर 31,000 रुपये/टन हो गया है.
- मूंगफली मील 44,000 रुपये/टन से घटकर 20,000 रुपये/टन पर आ गया है.
उद्योग और किसानों पर असर
SEA अध्यक्ष संजीव अस्थान का कहना है कि यह निर्यात बैन अपने असली मकसद को पूरा नहीं कर पाया है. दूध और पशु चारे की कीमतों को स्थिर करने के बजाय इसने पूरी सप्लाई चेन को नुकसान पहुंचाया है.
आज स्थिति यह है कि राइस ब्रान एक्सट्रैक्शन यूनिट्स आधी क्षमता पर भी काम नहीं कर पा रही हैं. कई इकाइयाँ घाटे में चल रही हैं और बंद होने के कगार पर हैं. वहीं, धान मिलों पर भी इसका बुरा असर पड़ा है क्योंकि भूसी की खपत घट गई है.
इसका सीधा असर किसानों पर भी पड़ा है. जब भूसी की मांग कम हुई तो धान की बिक्री पर दबाव बढ़ा और किसानों को अपने उत्पाद का उचित दाम नहीं मिल पाया. नतीजतन, यह बैन उद्योग से लेकर किसानों तक सबको प्रभावित कर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में पीछे छूटने का खतरा
एसोसिएशन का कहना है कि अगर अभी बैन हट भी जाए, तो खोया हुआ निर्यात बाजार वापस पाने में वक्त और निवेश लगेगा. इससे भारत की प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी.
SEA की सरकार से अपील
SEA ने साफ कहा है कि अगर जल्द बैन नहीं हटाया गया तो कई इकाइयां स्थायी रूप से बंद हो सकती हैं और भारत अपने अंतरराष्ट्रीय ग्राहक खो देगा. अगर सरकार समय रहते हस्तक्षेप करे तो यह किसानों, उद्योग और देश की विदेशी मुद्रा आय सभी के लिए फायदेमंद होगा.