दाल की कीमतों पर लगेगा ब्रेक, अरहर-उड़द का आयात FY27 तक फ्री… जानें क्या होगा असर?

भारत दुनिया के सबसे बड़े दाल उपभोक्ता देशों में शामिल है, लेकिन उत्पादन अभी भी पूरी मांग को पूरा नहीं कर पाता. यही वजह है कि देश को हर साल अपनी जरूरत का करीब 18 से 20 प्रतिशत दाल आयात करना पड़ता है. ऐसे में ड्यूटी फ्री आयात का फैसला उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों के लिए राहत भरा माना जा रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 1 Apr, 2026 | 10:41 AM

Pulses duty free import FY27: देश में दालों की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति की कमी को देखते हुए सरकार ने एक अहम फैसला लिया है. सरकार ने अरहर (तूर) और उड़द दाल के ड्यूटी फ्री आयात की सुविधा को एक साल और बढ़ाकर 31 मार्च 2027 तक कर दिया है. इस कदम का मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रण में रखना है.

पिछले कुछ समय से दालों की मांग और उत्पादन के बीच अंतर देखने को मिल रहा है, जिसके कारण सरकार को आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है. ऐसे में यह फैसला उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों के लिए राहत भरा माना जा रहा है.

पीली मटर के आयात पर जारी रहेगा 30 प्रतिशत शुल्क

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, सरकार ने जहां अरहर और उड़द को ड्यूटी फ्री रखा है, वहीं पीली मटर के आयात पर 30 प्रतिशत शुल्क जारी रखने का फैसला लिया है. हालांकि, इसके आयात पर न्यूनतम मूल्य और पोर्ट से जुड़ी पाबंदियों को भी FY27 तक हटा दिया गया है, जिससे व्यापार को आसान बनाने की कोशिश की गई है.

साथ ही, पीली मटर आयात करने वाले व्यापारियों को उपभोक्ता मामलों के विभाग के ऑनलाइन इंपोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम में पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा. इससे सरकार आयात पर नजर रख सकेगी और बाजार में संतुलन बनाए रखेगी.

भारत क्यों करता है दालों का आयात

भारत दुनिया के सबसे बड़े दाल उपभोक्ता देशों में शामिल है, लेकिन उत्पादन अभी भी पूरी मांग को पूरा नहीं कर पाता. यही वजह है कि देश को हर साल अपनी जरूरत का करीब 18 से 20 प्रतिशत दाल आयात करना पड़ता है. भारत अरहर, उड़द और पीली मटर जैसी दालें म्यांमार, मोजाम्बिक, मलावी, तंजानिया, कनाडा, ब्राजील, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से आयात करता है.

आयात नीति में स्थिरता से बाजार को मिलेगा सहारा

विशेषज्ञों का मानना है कि आयात नीति में निरंतरता बनाए रखना बाजार के लिए काफी जरूरी होता है. इससे व्यापारियों को भविष्य की योजना बनाने में आसानी होती है और सप्लाई चेन भी सुचारू रहती है. इस फैसले से बाजार में अनिश्चितता कम होगी और दालों की उपलब्धता बेहतर बनी रहेगी.

पिछले वर्षों में बदले नियम

सरकार ने समय-समय पर दालों के आयात को लेकर अलग-अलग फैसले लिए हैं. साल 2017 में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए दालों पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया था. इसके बाद अक्टूबर 2025 में पीली मटर पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क और 20 प्रतिशत कृषि अवसंरचना विकास सेस लगाया गया. वहीं, दिसंबर 2023 में चना उत्पादन कम होने की आशंका के चलते सस्ती दालों के ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति दी गई थी.

आयात के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव

हाल के आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से जनवरी के बीच दालों का कुल आयात करीब 18 प्रतिशत घटकर 4.9 मिलियन टन रह गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 6.01 मिलियन टन था.

हालांकि, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने रिकॉर्ड 7.3 मिलियन टन दालों का आयात किया था.

अगर अलग-अलग दालों की बात करें तो पीली मटर 49 प्रतिशत और मसूर के आयात में 24 प्रतिशत की कमी आई है. वहीं, उड़द और अरहर के आयात में बढ़ोतरी देखने को मिली है. उड़द का आयात करीब 35 प्रतिशत बढ़कर 0.9 मिलियन टन और अरहर का आयात 15 प्रतिशत बढ़कर 1.3 मिलियन टन तक पहुंच गया है.

उपभोक्ताओं और किसानों पर असर

सरकार के इस फैसले का सीधा असर बाजार और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. दालों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहने से कीमतों में तेजी आने की संभावना कम होगी.

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक ड्यूटी फ्री आयात से घरेलू किसानों पर दबाव भी बढ़ सकता है. इसलिए सरकार को आयात और घरेलू उत्पादन के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा.

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