India Israel agriculture partnership: भारत और इजरायल के संबंध अब केवल राजनीतिक मंचों या कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं. यह साझेदारी अब सीधे खेतों, तालाबों और समुद्र किनारे बसे मछुआरों तक पहुंचने की तैयारी में है. हाल में हुए समझौतों से साफ होता है कि आने वाले समय में भारतीय किसानों और मत्स्य पालकों को आधुनिक तकनीक का सीधा फायदा मिल सकता है. इस सहयोग का उद्देश्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती और जलीय क्षेत्र को ज्यादा टिकाऊ, वैज्ञानिक और लाभकारी बनाना है.
डीडी न्यूज के अनुसार, प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे के दौरान दोनों देशों ने अपने रिश्तों को “स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” का दर्जा देने पर सहमति जताई. इस दौरान कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. कृषि, मत्स्य पालन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, शिक्षा, वित्तीय सेवाएं, साइबर सुरक्षा और श्रम गतिशीलता जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करने का फैसला हुआ. विदेश मंत्रालय ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ये समझौते भविष्य की दिशा तय करेंगे और दोनों देशों के संबंधों को नई मजबूती देंगे.
खेती में नई सोच और नई तकनीक
इस साझेदारी का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र में दिखाई देगा. भारत और इजरायल मिलकर एक नवाचार केंद्र स्थापित करेंगे, जहां आधुनिक खेती की तकनीकों पर काम होगा. इजरायल कम पानी और सीमित जमीन में भी बेहतर उत्पादन के लिए जाना जाता है. वहां ड्रिप सिंचाई और स्मार्ट खेती के मॉडल पहले से सफल हैं. भारत अब इन अनुभवों को अपने किसानों तक पहुंचाना चाहता है.
प्रिसिजन फार्मिंग यानी जरूरत के अनुसार पानी, खाद और दवाओं का इस्तेमाल इस योजना का अहम हिस्सा होगा. इससे लागत कम होगी और फसल की गुणवत्ता बेहतर होगी. उपग्रह आधारित सिंचाई प्रणाली और आधुनिक कृषि मशीनरी को भी बढ़ावा दिया जाएगा. साथ ही, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए भंडारण और प्रोसेसिंग की नई तकनीकों पर काम किया जाएगा.
दोनों देशों के वैज्ञानिक मिलकर बीज सुधार, कीट प्रबंधन और नई किस्मों के विकास पर शोध करेंगे. इससे किसानों को बेहतर बीज और वैज्ञानिक सलाह मिल सकेगी. शोध के साथ-साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जाएंगे, ताकि नई तकनीक सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि खेतों तक पहुंचे.
मत्स्य पालन में भी नई रफ्तार
भारत में मत्स्य पालन करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा है. इस क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने का फैसला किया है. आधुनिक मत्स्य प्रणालियों, रोग प्रबंधन और मैरीकल्चर यानी समुद्री खेती को बढ़ावा दिया जाएगा.
सीवीड यानी समुद्री शैवाल की खेती जैसे नए विकल्पों पर भी ध्यान दिया जाएगा. यह क्षेत्र भविष्य में बड़े निर्यात अवसर दे सकता है. नई तकनीकों से उत्पादन बढ़ेगा और पर्यावरण को भी कम नुकसान होगा.
प्रशिक्षण और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना के जरिए मछुआरों और युवाओं को नई तकनीकों की जानकारी दी जाएगी. इससे उनकी आय बढ़ाने के नए रास्ते खुल सकते हैं.
तकनीक का बढ़ता दायरा
इस सहयोग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित तकनीकों को भी शामिल किया गया है. खेती और मत्स्य पालन में डेटा का इस्तेमाल कर यह तय किया जा सकेगा कि कब सिंचाई करनी है, किस फसल में कितना पोषण देना है और रोग से कैसे बचाव करना है. इससे जोखिम कम होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा.
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ये योजनाएं सही तरीके से जमीन पर उतरीं, तो गांवों की तस्वीर बदल सकती है. किसानों की लागत घटेगी, उत्पादन बढ़ेगा और बाजार तक पहुंच मजबूत होगी. इसी तरह मत्स्य पालकों को भी बेहतर तकनीक और प्रशिक्षण से फायदा मिलेगा.