अचार वाले खीरे की खेती पर अमेरिकी टैरिफ की मार, उत्पादन में कटौती को मजबूर हुए किसान

अमेरिकी टैरिफ के असर को देखते हुए निर्यातकों ने अब उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है. गेरकिन का निर्यात आमतौर पर बल्क और बोतलबंद, दोनों रूपों में किया जाता है. अतिरिक्त शुल्क का बोझ फिलहाल खरीदार और निर्यातक मिलकर उठा रहे हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 4 Jan, 2026 | 09:37 AM

US tariffs impact: भारत में अचार बनाने में इस्तेमाल होने वाला छोटा खीरा, जिसे गेरकिन कहा जाता है, अब एक बड़े आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है. वर्षों से निर्यात पर निर्भर इस उद्योग के लिए आने वाला समय आसान नहीं दिख रहा. वित्त वर्ष 2026 में गेरकिन के निर्यात में करीब 10 प्रतिशत तक गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा लगाया गया अतिरिक्त आयात शुल्क है, जिसने भारत के सबसे बड़े बाजार में मांग को कमजोर कर दिया है. हालांकि रुपये की कमजोरी से निर्यातकों को मूल्य के स्तर पर थोड़ी राहत मिली है, लेकिन कुल निर्यात मात्रा में गिरावट लगभग तय मानी जा रही है.

अमेरिका पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

भारतीय गेरकिन उद्योग का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार पर निर्भर है. कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत मानी जाती है. ऐसे में जब अमेरिका ने आयात शुल्क बढ़ाया, तो उसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ा. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि भले ही डॉलर मजबूत होने से निर्यात मूल्य में कुछ संतुलन बन जाए, लेकिन भेजी जाने वाली खेप की मात्रा घटेगी, जिससे उत्पादन और किसानों की आमदनी दोनों प्रभावित होंगी.

दूसरे बाजारों में रास्ता आसान नहीं

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका से झटका लगने के बाद निर्यातक यूरोप और रूस जैसे वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं. यूरोप में पहले से ही गेरकिन का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है और तुर्की जैसे देश वहां भारत के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा पेश कर रहे हैं. पूर्वी यूरोप के कुछ देशों में भी स्थानीय उत्पादन होने के कारण भारतीय गेरकिन को अपेक्षित कीमत नहीं मिल पा रही है. रूस में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं, जहां मांग सीमित और प्रतिस्पर्धा ज्यादा है.

आंकड़े दिखाते हैं पिछली मजबूती

अगर हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो उद्योग की मजबूती साफ दिखती है. कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से अक्टूबर के बीच खीरे और गेरकिन का निर्यात मूल्य करीब 169.71 मिलियन डॉलर रहा, जो पिछले साल इसी अवधि में 159.02 मिलियन डॉलर था. मात्रा के लिहाज से भी निर्यात बढ़कर 1.69 लाख टन पहुंच गया. पूरे वित्त वर्ष 2024-25 में तो गेरकिन निर्यात ने 306.72 मिलियन डॉलर और 2.89 लाख टन का रिकॉर्ड स्तर छू लिया था. इसी मजबूत प्रदर्शन के बाद अचानक आई यह गिरावट उद्योग के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है.

उत्पादन घटाने को मजबूर निर्यातक

अमेरिकी टैरिफ के असर को देखते हुए निर्यातकों ने अब उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है. गेरकिन का निर्यात आमतौर पर बल्क और बोतलबंद, दोनों रूपों में किया जाता है. अतिरिक्त शुल्क का बोझ फिलहाल खरीदार और निर्यातक मिलकर उठा रहे हैं, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं मानी जा रही. यही वजह है कि कई कंपनियां जोखिम कम करने के लिए खेती का रकबा घटा रही हैं और नए अनुबंध सीमित कर रही हैं.

किसानों पर सीधा असर

भारत में गेरकिन की खेती मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु में अनुबंध खेती के तहत होती है. घरेलू बाजार में इसकी मांग लगभग नहीं के बराबर है, इसलिए किसान पूरी तरह निर्यात पर निर्भर रहते हैं. जब निर्यात घटता है, तो उसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है. उत्पादन में कटौती का मतलब है कि आने वाले मौसम में कई किसानों को कम फसल बोने के लिए कहा जा सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा.

सरकारी राहत की उम्मीद

इस मुश्किल दौर में उद्योग की नजर सरकार की ओर टिकी हुई है. निर्यातक चाहते हैं कि व्यापार नीति में घोषित 3 प्रतिशत ब्याज छूट जल्द लागू हो, ताकि बढ़ती लागत का कुछ बोझ कम किया जा सके. इसके अलावा GST रिफंड में हो रही देरी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. कई निर्यातकों का कहना है कि रिफंड मिलने में 30 से 40 दिन लग जाते हैं, जिससे कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ता है.

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