Maize Crop Disease: हिमाचल प्रदेश में मक्का की फसल पर फॉल आर्मीवॉर्म (FAW) नामक खतरनाक कीट का हमला शुरू हो गया है. इसे देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है और खेतों में निगरानी बढ़ा दी है. अधिकारियों का कहना है कि यदि समय रहते इस कीट पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो खरीफ सीजन में कई जिलों में मक्का की फसल को भारी नुकसान हो सकता है. यह कीट कांगड़ा, चंबा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर और मंडी समेत उत्तर क्षेत्र के सभी छह जिलों में फैल चुका है. इन जिलों में करीब 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की खेती होती है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि विभाग का कहना है कि कांगड़ा के भवारना ब्लॉक और चंबा के भटियात ब्लॉक में अब तक करीब 15 प्रतिशत फसल इस कीट से प्रभावित पाई गई है. इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करने और समय पर बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी गई है. फॉल आर्मीवॉर्म मक्का की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले सबसे खतरनाक कीटों में से एक है. यह कीट 2018 में सबसे पहले कर्नाटक में पाया गया था और 2019 में हिमाचल प्रदेश में इसकी पुष्टि हुई.
फॉल आर्मीवॉर्म तेजी से देते हैं अंडे
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गर्म मौसम में यह कीट बहुत तेजी से बढ़ता है. इसकी मादा पतंगा पत्तियों के नीचे 100 से 200 अंडों का एक समूह देती है और अपने पूरे जीवनकाल में 700 से 800 अंडे तक दे सकती है. ये अंडे 2 से 3 दिन में निकल जाते हैं. अंडों से निकलने वाले लार्वा (सूंडी) 14 से 22 दिनों तक फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. यह मक्का की पत्तियों, बीच वाले हिस्से (व्हॉर्ल), फूल (टैसल) और भुट्टों को खाकर फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाता है, जिससे उत्पादन काफी कम हो सकता है.
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कीट 8 से 13 दिन तक मिट्टी में प्यूपा अवस्था में रहता है
इसके बाद कीट 8 से 13 दिन तक मिट्टी में प्यूपा अवस्था में रहता है. फिर वयस्क पतंगा बनकर बाहर निकलता है, जिसकी उम्र 7 से 21 दिन होती है. यह निकलने के 3 से 4 दिन बाद ही दोबारा अंडे देना शुरू कर देता है, जिससे इसका प्रकोप तेजी से फैलता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस कीट का वयस्क पतंगा एक रात में 100 किलोमीटर तक उड़ सकता है, इसलिए यह बहुत तेजी से एक इलाके से दूसरे इलाके में फैल जाता है. कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक (उत्तर क्षेत्र) डॉ. राहुल कटोच ने किसानों से कहा है कि वे नियमित रूप से अपने मक्का के खेतों का निरीक्षण करें और कीट के प्रकोप के अनुसार ही नियंत्रण के उपाय अपनाएं.
इन कीटनाशकों के इस्तेमाल करने की सलाह
उन्होंने सलाह दी कि यदि फॉल आर्मीवॉर्म का प्रकोप 10 प्रतिशत से कम है, तो रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल न करें. इसकी जगह नीम आधारित दवाएं, जैव-कीटनाशक और प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले घोल का उपयोग करें, ताकि कीट पर नियंत्रण पाया जा सके. अगर खेत में 10 प्रतिशत से अधिक फसल प्रभावित हो जाती है, तो किसानों को कृषि विभाग द्वारा अनुमोदित कीटनाशकों जैसे क्लोरैन्ट्रानिलिप्रोल (Chlorantraniliprole) या इमामेक्टिन बेंजोएट (Emamectin Benzoate) का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इसके लिए 0.4 मिली दवा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल तैयार करने को कहा गया है.
60 रुपये किलो की दर से मक्के की खरीद
डॉ. कटोच ने प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचने की भी सलाह दी. उन्होंने कहा है कि हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती से उगाए गए मक्का की सरकारी खरीद 60 रुपये प्रति किलो की दर से की जाती है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब फसल पूरी तरह रसायन मुक्त होगी. कृषि विभाग ने किसानों से कहा है कि वे केवल रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर न रहें, बल्कि एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) अपनाएं. इसके तहत खेत की गहरी जुताई, खेत की साफ-सफाई, खरपतवार नियंत्रण, जलभराव रोकना, बुवाई से पहले बीज उपचार, नियमित रूप से फसल का निरीक्षण और फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है.