शहतूत की निजी नर्सरी से बदलेगी किसानों की किस्मत, 27 हजार परिवारों की आय बढ़ाने की तैयारी

जम्मू-कश्मीर सरकार ने रेशम उद्योग को मजबूत बनाने के लिए नई पहल शुरू की है. शहतूत की निजी नर्सरी स्थापित कर उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार का लक्ष्य रखा गया है. इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बनेंगे और पारंपरिक रेशम उद्योग को नई पहचान मिलने की उम्मीद है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 25 Jun, 2026 | 02:35 PM

Jammu Kashmir Silk: जम्मू-कश्मीर में रेशम उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. प्रदेश में पहली बार शहतूत की निजी नर्सरी स्थापित करने की योजना बनाई गई है. इस पहल का उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले शहतूत के पौधों की उपलब्धता बढ़ाना, रेशम उत्पादन को मजबूत करना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना है. सरकार ने अगले पांच वर्षों में 225 टन कच्चे रेशम के उत्पादन का लक्ष्य तय किया है, जिससे हजारों किसानों और महिलाओं को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है.

उत्तराखंड मॉडल से मिलेगा नया रास्ता

रेशम उत्पादन विकास विभाग के अनुसार, जम्मू-कश्मीर इस योजना को लागू करने से पहले उत्तराखंड के सफल निजी नर्सरी मॉडल का अध्ययन करेगा. इसके लिए अधिकारियों की एक टीम जल्द ही उत्तराखंड का दौरा करेगी. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, विभाग के निदेशक ने बताया कि उत्तराखंड ने निजी नर्सरियों और आधुनिक तकनीकों के जरिए रेशम उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है. यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर भी इस मॉडल को अपनाकर अपने पारंपरिक रेशम उद्योग  को मजबूत करना चाहता है.

देश का प्रमुख बाइवोल्टाइन रेशम उत्पादक है उत्तराखंड

उत्तराखंड को आज देश में उच्च गुणवत्ता वाले बाइवोल्टाइन रेशम कोकून  के सबसे बड़े उत्पादकों में गिना जाता है. राज्य को बाइवोल्टाइन सिल्क का कटोरा भी कहा जाता है. यहां रेशम की चारों प्रमुख किस्मों-शहतूत, ओक टसर, मूंगा और एरी-का उत्पादन किया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, वहां का अनुकूल मौसम, नियंत्रित तापमान और उपयुक्त नमी रेशम की खेती के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करते हैं. जम्मू-कश्मीर सरकार को उम्मीद है कि इसी मॉडल से प्रेरणा लेकर स्थानीय रेशम उद्योग को नई दिशा दी जा सकेगी.

27 हजार ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ा है उद्योग

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में करीब 27 हजार ग्रामीण परिवारों  की आजीविका रेशम उत्पादन पर निर्भर है. वर्तमान में प्रदेश में हर साल लगभग 800 से 900 टन कोकून का उत्पादन होता है. इस क्षेत्र में छोटे किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जबकि बड़ी संख्या में महिलाएं भी इससे जुड़ी हुई हैं. रेशम उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है, लेकिन अभी इसकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है.

आधुनिक तकनीक और किसान मेलों पर रहेगा फोकस

रेशम उत्पादन  बढ़ाने के लिए सरकार वैज्ञानिक तरीकों को बढ़ावा देने की भी तैयारी कर रही है. अधिकारियों ने बताया कि कीट रोगों की निगरानी के लिए विशेष टीमें बनाई जाएंगी, जिससे फसल नुकसान को कम किया जा सके. साथ ही, शहतूत के पौधों को हानिकारक कीटनाशकों से बचाने के लिए रेशम उत्पादन को गैर-बागान और आदिवासी क्षेत्रों तक विस्तार देने की योजना है. किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने और जागरूकता बढ़ाने के लिए इस वर्ष के अंत तक कश्मीर और राजौरी में बड़े किसान मेलों का आयोजन भी किया जाएगा. सरकार को उम्मीद है कि इन प्रयासों से रेशम उद्योग में उत्पादन बढ़ेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे.

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