Parali Management: देश के कई राज्यों में गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली किसानों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है. ज्यादातर किसान खेत साफ करने के लिए पराली जला देते हैं, लेकिन इससे मिट्टी की ताकत कम होती है और पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचता है. अब कृषि विशेषज्ञ किसानों को पराली जलाने के बजाय उसका सही इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर किसान पराली को खेत में ही सही तरीके से इस्तेमाल करें, तो यह प्राकृतिक खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकती है. इससे खेती की लागत कम होगी और फसल उत्पादन में भी फायदा मिलेगा.
पराली जलाने से मिट्टी और पर्यावरण दोनों को नुकसान
गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष बच जाते हैं. हार्वेस्टर मशीन से कटाई होने के कारण खेतों में पराली ज्यादा मात्रा में जमा हो जाती है. कई किसान जल्दी खेत खाली करने के लिए इन अवशेषों में आग लगा देते हैं. इससे धुआं फैलता है और वायु प्रदूषण बढ़ता है. साथ ही मिट्टी में मौजूद जरूरी पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया और सूक्ष्म जीव खत्म हो जाते हैं, जो फसल के लिए बहुत जरूरी होते हैं. लगातार ऐसा करने से मिट्टी कमजोर होने लगती है और उत्पादन पर असर पड़ता है. इसके अलावा धुएं के कारण आसपास के लोगों को सांस लेने में परेशानी भी होती है. यही वजह है कि अब किसानों को पराली प्रबंधन के नए तरीके अपनाने की सलाह दी जा रही है.
खेत में ही पराली को खाद में बदल सकते हैं किसान
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किसान बहुत आसान तरीके से पराली को खेत में ही जैविक खाद में बदल सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले कटाई के बाद खेत में हल्की सिंचाई करनी चाहिए. इसके बाद रोटावेटर या हल्की जुताई करके पराली को मिट्टी में मिला देना चाहिए. मिट्टी में नमी मिलने के बाद कुछ ही समय में यह पराली धीरे-धीरे सड़ने लगती है और प्राकृतिक खाद में बदल जाती है. अगर खेत में पराली ज्यादा मात्रा में हो, तो सिंचाई के साथ प्रति एकड़ करीब 25 किलो यूरिया का छिड़काव करने से सड़ने की प्रक्रिया और तेज हो जाती है. यह तरीका न केवल आसान है बल्कि इससे खेत की मिट्टी भी मजबूत बनती है.
मिट्टी की ताकत बढ़ाने में मदद करती है पराली
वैज्ञानिकों का कहना है कि खेत में सड़ी हुई पराली मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ाती है. इससे मिट्टी ज्यादा उपजाऊ बनती है. इसके अलावा खेत की पानी रोकने की क्षमता भी मजबूत होती है. गर्मी के मौसम में खेत की नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे फसल को फायदा मिलता है. जब मिट्टी में प्राकृतिक खाद बढ़ती है, तो किसानों को रासायनिक खाद पर कम खर्च करना पड़ता है. इससे डीएपी और यूरिया जैसी महंगी खादों की जरूरत भी कम हो सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार लगातार पराली का सही उपयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक बेहतर बनी रहती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है.
खेती की लागत घटाने का आसान तरीका बन रही नई सोच
आज खेती में बढ़ती लागत किसानों के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है. ऐसे में पराली को जलाने के बजाय खाद के रूप में इस्तेमाल करना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. इससे खेत साफ करने में आसानी होती है और अलग से जैविक खाद खरीदने की जरूरत भी कम पड़ती है. कृषि विशेषज्ञ किसानों को लगातार जागरूक कर रहे हैं कि पराली कोई बेकार चीज नहीं, बल्कि खेतों का खजाना है. अगर इसका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो यह खेती की लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. पराली प्रबंधन के इस तरीके को अपनाकर किसान पर्यावरण की रक्षा के साथ अपनी मिट्टी और फसल दोनों को मजबूत बना सकते हैं.