अगर लौकी के छोटे फल सड़ रहे हैं तो समझिए कहां हो रही है चूक, जानें आसान समाधान

Bottle gourd fruit rot: लौकी के छोटे फलों का खराब होना किसी एक वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मौसम, रोग, कीट और खेती की तकनीक से जुड़ी कई बातें जिम्मेदार होती हैं. अगर समय रहते कारण पहचान लिया जाए तो फसल को बचाया जा सकता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 27 Feb, 2026 | 03:44 PM

Bottle gourd fruit rot: लौकी भारतीय रसोई की एक आम लेकिन बेहद फायदेमंद सब्जी है. गर्मियों और बरसात में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है. कम लागत और जल्दी तैयार होने वाली फसल होने के कारण यह किसानों के लिए कमाई का अच्छा जरिया भी है. लेकिन कई बार ऐसा होता है कि पौधे पर फल तो खूब लगते हैं, पर छोटे-छोटे नवजात फल पीले पड़कर सड़ने लगते हैं और जमीन पर गिर जाते हैं. किसान समझ नहीं पाते कि मेहनत के बावजूद नुकसान क्यों हो रहा है.

दरअसल, लौकी के छोटे फलों का खराब होना किसी एक वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मौसम, रोग, कीट और खेती की तकनीक से जुड़ी कई बातें जिम्मेदार होती हैं. अगर समय रहते कारण पहचान लिया जाए तो फसल को बचाया जा सकता है. आइए  जानते हैं कि आखिर लौकी के छोटे फल क्यों सड़ते हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है.

बरसात और ज्यादा नमी बनती है बड़ी वजह

सरकारी वेबसाइट PPQS.gov.in के अनुसार, लौकी की फसल को हल्की नमी पसंद होती है, लेकिन जब खेत में पानी ज्यादा ठहर जाता है या लगातार बारिश होती रहती है तो समस्या शुरू हो जाती है. ज्यादा नमी से पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं. मिट्टी में हवा का संचार कम हो जाता है, जिससे जड़ें ठीक से काम नहीं कर पातीं. इसका असर सीधे फलों पर पड़ता है.

बरसात के मौसम में खासकर फफूंद जनित रोग तेजी से फैलते हैं. छोटे फलों पर पहले हल्के भूरे या काले धब्बे बनते हैं, फिर वे बढ़कर सड़न में बदल जाते हैं. कई बार फल नरम होकर गिर जाते हैं. अगर खेत में जलभराव हो जाए तो यह समस्या और बढ़ जाती है.

फफूंद और जीवाणु रोग का हमला

लौकी में फाइटोफ्थोरा ब्लाइट और एन्थ्रेक्नोज जैसे रोग अक्सर छोटे फलों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन रोगों में फल पर गोल या अनियमित धब्बे दिखते हैं. धीरे-धीरे ये धब्बे फैलते हैं और फल सड़ जाता है.

कुछ मामलों में बैक्टीरियल सड़न भी देखी जाती है. इसमें फल पर पानी से भीगे हुए धब्बे बनते हैं और अंदर से गलन शुरू हो जाती है. कई बार फल से बदबू भी आने लगती है. यह समस्या ज्यादा नमी और गंदी खेत व्यवस्था के कारण बढ़ती है.

कीट भी कर देते हैं अंदर से नुकसान

लौकी की फसल में फ्रूट फ्लाई यानी फल मक्खी एक बड़ी समस्या है. यह कीट छोटे फलों में अंडे दे देता है. अंडों से निकलने वाले कीड़े फल के अंदर ही उसे खाने लगते हैं. बाहर से फल ठीक दिख सकता है, लेकिन अंदर से सड़ चुका होता है. इसके अलावा रेड पंपकिन बीटल जैसे कीट पत्तियों और फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है और फल सही से विकसित नहीं हो पाते.

पोषण असंतुलन और गलत देखभाल

कई बार किसान ज्यादा उत्पादन के चक्कर में जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल कर लेते हैं. इससे पौधे की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है. अगर नाइट्रोजन ज्यादा और पोटाश कम दिया जाए तो पौधे में हरियाली तो बढ़ती है, लेकिन फल कमजोर बनते हैं. इसी तरह, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी फलों के गिरने और सड़ने का कारण बन सकती है.

सही प्रबंधन से कैसे बचाएं फसल

  • सबसे पहले खेत में पानी रुकने न दें. अगर संभव हो तो ऊंची क्यारियों पर बुवाई करें. ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की सही मात्रा मिलती है और जलभराव से बचाव होता है.
  • बीज बोने से पहले बीज उपचार जरूर करें. जैविक फफूंदनाशक या ट्राइकोडर्मा से बीज का उपचार करने से शुरुआती रोगों से सुरक्षा मिलती है.
  • खेत की साफ-सफाई भी बहुत जरूरी है. गिरे हुए सड़े फल तुरंत हटा दें, ताकि रोग फैलने का खतरा कम हो. पौधों के बीच उचित दूरी रखें, जिससे हवा और धूप का अच्छा संचार हो सके.
  • कीट नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे फल मक्खी की संख्या नियंत्रित रहती है. जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से जैविक या कम विषैले कीटनाशक का प्रयोग करें.

संतुलित खाद और समय पर तुड़ाई

लौकी में संतुलित उर्वरक प्रबंधन बेहद जरूरी है. गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट का उपयोग मिट्टी की सेहत सुधारता है. पोटाश और सूक्ष्म तत्वों की उचित मात्रा फल की मजबूती बढ़ाती है. फल तैयार होने के बाद समय पर तुड़ाई भी जरूरी है. ज्यादा बड़े होने तक छोड़ देने से पौधे पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और नए फलों के विकास पर असर पड़ सकता है.

अच्छी देखभाल से मिल सकती है बेहतर पैदावार

आमतौर पर लौकी की फसल 50 से 60 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. सही देखभाल और रोग नियंत्रण के साथ एक हेक्टेयर से 200 से 250 क्विंटल तक उपज मिल सकती है.

अगर किसान मौसम, रोग और कीट की समय पर पहचान कर लें और संतुलित खेती अपनाएं, तो छोटे फलों के सड़ने की समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है. सही जानकारी और सावधानी ही इस फसल को नुकसान से बचाने की कुंजी है.

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