Livestock Health: मौसम में लगातार हो रहे बदलाव के साथ पशुओं में कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. खासकर ठंड-गर्म, उमस और बारिश के दौरान पशुपालकों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है. इन दिनों अफरा (Bloat) ऐसी बीमारी है, जो समय पर इलाज न मिलने पर पशु की जान तक ले सकती है. ये बीमारी मुख्य रूप से गाय, भैंस, बकरी और अन्य जुगाली करने वाले पशुओं में देखने को मिलती है. पशुपालन विभाग के अनुसार, सही समय पर लक्षण पहचानकर तुरंत उपचार शुरू किया जाए तो पशु को गंभीर स्थिति से बचाया जा सकता है.
कैसे होती है अफरा बीमारी और क्यों है इतनी खतरनाक?
पशुपालन विभाग के अनुसार, जब पशु के पेट में खाया हुआ चारा ठीक से नहीं पचता और सड़ने लगता है, तब अमोनिया, मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें बनने लगती हैं. ये गैसें पेट में जमा होकर उसे तेजी से फुला देती हैं. यदि समय पर गैस बाहर नहीं निकलती तो पशु को सांस लेने में परेशानी होने लगती है और हालत तेजी से गंभीर हो सकती है. कई मामलों में लापरवाही जानलेवा भी साबित हो सकती है.
इन गलतियों से बढ़ जाता है बीमारी का खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, बासी या खराब चारा खिलाना, जरूरत से ज्यादा हरा चारा देना, दाने की मात्रा अचानक बढ़ा देना, एकदम से खान-पान बदल देना, शारीरिक मेहनत के तुरंत बाद पानी पिलाना और मौसम में अचानक बदलाव जैसी स्थितियां अफरा बीमारी का बड़ा कारण बनती हैं. इसलिए पशुओं का आहार हमेशा संतुलित और ताजा होना चाहिए. किसी भी बदलाव को धीरे-धीरे अपनाना चाहिए ताकि पाचन तंत्र पर असर न पड़े.
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ऐसे पहचानें बीमारी के शुरुआती लक्षण
अफरा होने पर पशु का पेट तेजी से फूलने लगता है. पेट पर हल्का थपथपाने से ढम-ढम जैसी आवाज सुनाई देती है. पशु बेचैन हो जाता है, बार-बार उठने-बैठने की कोशिश करता है, खाना छोड़ देता है और सांस लेने में दिक्कत महसूस करता है. ऐसे लक्षण दिखाई देते ही बिना देरी किए पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. शुरुआती इलाज से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है.
बचाव के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय
पशुपालन विभाग के अनुसार, अफरा बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को हमेशा ताजा और साफ चारा दें. बासी या फफूंद लगा चारा बिल्कुल न खिलाएं. हरे चारे और दाने की मात्रा संतुलित रखें तथा आहार में अचानक बदलाव न करें. मेहनत या लंबी दूरी चलने के तुरंत बाद अधिक पानी न पिलाएं. यदि शुरुआती लक्षण दिखाई दें तो तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें. कुछ मामलों में चिकित्सक की सलाह के अनुसार घरेलू उपाय भी किए जा सकते हैं, लेकिन गंभीर स्थिति में केवल घरेलू उपचार पर निर्भर रहना उचित नहीं है. समय पर इलाज और सही देखभाल से इस खतरनाक बीमारी से पशुओं की जान बचाई जा सकती है और पशुपालकों को बड़े आर्थिक नुकसान से भी बचाया जा सकता है.