Milk Fever: दूध देने वाले पशुओं में ब्याने के बाद का समय सबसे नाजुक माना जाता है. कई बार पशुपालक सोचते हैं कि पशु थकान की वजह से बैठ गया है, लेकिन अगर वह सुस्त होकर बैठ जाए, गर्दन पेट की तरफ मोड़ ले और शरीर ठंडा लगने लगे, तो ये साधारण कमजोरी नहीं बल्कि मिल्क फीवर (Milk Fever) हो सकता है. बिहार डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के अनुसार, ये बीमारी खासकर ज्यादा दूध देने वाली गाय और भैंस में देखने को मिलती है. इसमें शरीर में कैल्शियम की अचानक भारी कमी हो जाती है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो पशु की जान तक जा सकती है. इसलिए हर डेयरी किसान के लिए इसके लक्षण, बचाव और तुरंत इलाज जानना बहुत जरूरी है.
क्या है मिल्क फीवर और क्यों होता है
बिहार के डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के अनुसार, मिल्क फीवर का नाम सुनकर कई लोग समझते हैं कि इसमें पशु को बुखार आता होगा, लेकिन सच इसके बिल्कुल उल्टा है. इस बीमारी में पशु का शरीर गर्म होने के बजाय ठंडा पड़ने लगता है. इसकी मुख्य वजह है खून में कैल्शियम का अचानक कम हो जाना. जब पशु ब्याने के तुरंत बाद ज्यादा दूध देना शुरू करता है, तो दूध के साथ शरीर से बहुत तेजी से कैल्शियम निकलता है. अगर शरीर इतनी जल्दी इसकी भरपाई नहीं कर पाता, तो पशु कमजोर होकर बैठ जाता है. यही कारण है कि ज्यादा दूध देने वाली गाय-भैंस में यह बीमारी ज्यादा देखने को मिलती है.
ये लक्षण दिखें तो तुरंत हो जाएं सावधान
विभाग के अनुसार, मिल्क फीवर की शुरुआत अक्सर अचानक होती है. पशु सुस्त हो जाता है, उठने में दिक्कत होती है, गर्दन पेट की तरफ मोड़कर बैठ जाता है और आंखों में सुस्ती दिखती है. कई बार कान और शरीर ठंडे महसूस होते हैं. अगर हालत गंभीर हो जाए, तो पशु पूरी तरह उठ नहीं पाता और एक ही जगह पड़ा रहता है. भूख कम हो जाती है और दूध भी अचानक घट सकता है. कई पशुपालक इसे थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही सबसे बड़ी गलती साबित होती है.
बचाव के 3 आसान मंत्र
इस बीमारी से बचाव मुश्किल नहीं है, बस कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना होता है.
- पहला मंत्र: ब्याने के आखिरी 15 दिनों में ज्यादा कैल्शियम सप्लीमेंट न दें. इससे शरीर की प्राकृतिक कैल्शियम कंट्रोल प्रणाली कमजोर हो सकती है.
- दूसरा मंत्र: ब्याने के तुरंत बाद पशु को कैल्शियम जेल, बोलस या लिक्विड सप्लीमेंट जरूर दें. इससे शरीर को तुरंत सपोर्ट मिलता है.
- तीसरा मंत्र: ब्याने के बाद शुरुआती 2 से 3 दिन तक पूरा दूध एक बार में न निकालें. थोड़ा दूध छोड़ देने से शरीर पर अचानक कैल्शियम का दबाव कम पड़ता है.
इन तीन आसान उपायों से मिल्क फीवर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इलाज में देरी न करें, तुरंत डॉक्टर बुलाएं
अगर पशु बैठ जाए या ऊपर बताए गए लक्षण दिखें, तो बिल्कुल देर न करें. तुरंत प्रशिक्षित पशु चिकित्सक को बुलाएं. इस बीमारी का सबसे असरदार इलाज कैल्शियम की ड्रिप है, जो नस के जरिए दी जाती है. ध्यान रखें कि ड्रिप हमेशा विशेषज्ञ डॉक्टर से ही लगवाएं, क्योंकि गलत तरीके से देने पर खतरा बढ़ सकता है. समय पर इलाज मिलने पर अधिकतर पशु कुछ ही घंटों में उठकर सामान्य हो जाते हैं और दूध भी वापस सही मात्रा में आने लगता है.
सीधी बात यह है कि मिल्क फीवर में जितनी जल्दी पहचान और इलाज होगा, उतना ही पशु को बचाना आसान होगा. दूध देने वाले पशुओं की कमाई सीधे उनकी सेहत पर टिकी होती है, इसलिए ब्याने के बाद पहले 3 दिन खास निगरानी जरूर रखें. छोटी सी सावधानी पशु की जान बचा सकती है और डेयरी किसान को बड़े नुकसान से बचा सकती है.