गरीबों का गोट बैंक.. PM मोदी भी कर चुके हैं तारीफ, एक बकरी से बदल गई हजारों महिलाओं की तकदीर

महाराष्ट्र के जलगांव में एक ऐसा अनोखा गोट बैंक चल रहा है जहां पैसों का कोई लेन-देन नहीं होता. यहां गरीब महिलाओं को आजीविका के लिए बकरी उधार दी जाती है और ब्याज के रूप में उनसे बकरी का एक बच्चा (मेमना) वापस लिया जाता है. यह पहल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर बिजनेस वुमन बना रही है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 25 Jan, 2026 | 10:38 AM

Goat Bank : दुनिया भर में आपने ऐसे बैंक देखे होंगे जहां लंबी लाइनें नोट जमा करने के लिए लगती हैं, या जहां सोने के बदले लोन मिलता है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे बैंक के बारे में सुना है जहां काउंटर पर कैशियर नहीं, बल्कि बकरियां खड़ी होती हैं? जी हां भारत के महाराष्ट्र में एक ऐसा अनोखा बैंक है, जिसका जिक्र खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात में कर चुके हैं. इस बैंक में कर्ज के तौर पर कोई कागजी नोट नहीं बल्कि एक बकरी मिलती है और ब्याज में आपको पैसा नहीं बल्कि उस बकरी का बच्चा यानी मेमना लौटाना होता है. यह सिर्फ एक बैंक नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए सम्मान की नई पहचान बन चुका है, जिनके पास कभी फूटी कौड़ी भी नहीं थी.

जलगांव का गोट बैंक-जहां बकरी ही असली दौलत है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  महाराष्ट्र के जलगांव जिले में चल रहा यह गोट बैंक पारंपरिक बैंकिंग के हर नियम को तोड़ता है. यहां न तो चेक बुक की जरूरत है और न ही क्रेडिट स्कोर की. यह बैंक खास तौर पर उन गरीब, विधवा और भूमिहीन महिलाओं के लिए शुरू किया गया है, जिनके पास रोजगार का कोई साधन  नहीं था. पुणे की सेवा सहयोग फाउंडेशन द्वारा संचालित यह पहल आज चालीसगांव तहसील की महिलाओं के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है. यहां बकरी केवल एक जानवर नहीं, बल्कि इन महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा हथियार बन गई है.

कैसे काम करता है बकरी वाला लोन?

इस बैंक का काम करने का तरीका बहुत ही प्यारा और आसान है. सबसे पहले महिलाओं को बकरी पालन की ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे समझ सकें कि बकरी की सेहत का ध्यान कैसे रखना है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, बैंक उस महिला को एक स्वस्थ और विकसित बकरी  देता है. अब शर्त बस इतनी सी है-6 से 9 महीने बाद जब बकरी के बच्चे बड़े हो जाएं, तो उस महिला को ब्याज के रूप में एक मेमना बैंक को वापस करना होता है. बैंक इस मेमने को फिर किसी दूसरी जरूरतमंद महिला को दे देता है. इस तरह, मदद का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता और गांव-दर-गांव बढ़ता जाता है.

महिलाओं का एटीएम, जब जरूरत पड़ी, तो बकरी आई काम

गांवों में अब इस योजना को महिलाओं का एटीएम कहा जाने लगा है. इसके पीछे की वजह बड़ी भावुक है. ग्रामीण इलाकों  में महिलाओं को छोटे-छोटे खर्चों-जैसे बच्चों की स्कूल फीस, बीमारी का इलाज या घर की मरम्मत-के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ता था. लेकिन अब उनके पास अपनी खुद की पूंजी है. एक बकरी साल में 3 से 4 मेमने देती है. बैंक को एक बच्चा लौटाने के बाद भी महिला के पास 2-3 मेमने बच जाते हैं, जिन्हें बेचकर वह साल में 30,000 रुपये तक आसानी से कमा लेती है. यह कमाई उन्हें समाज में एक नया सिर उठाकर जीने का मौका दे रही है.

पशुपालक से बिजनेस वुमन तक का सफर

इस बैंक की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब यहां की महिलाएं सिर्फ बकरी पालने तक सीमित नहीं रहीं. अपनी मेहनत और जमा की हुई पूंजी से उन्होंने मिलकर गिरणा परिसर महिला पशुपालक उत्पादक  कंपनी बना ली है. अब ये महिलाएं खुद अपनी कंपनी चला रही हैं और व्यापार के गुर सीख रही हैं. यह इस बात का सबूत है कि अगर सही तरीके से हाथ थामा जाए, तो एक छोटी सी बकरी भी गरीबी की बेड़ियां काट सकती है. इस बैंक ने साबित कर दिया कि असली तरक्की नोटों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनने से आती है.

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