जलवायु परिवर्तन का असर अब बकरी पालन पर भी साफ दिखाई देने लगा है. बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, लंबे समय तक सूखा और अचानक मौसम बदलने जैसी परिस्थितियों से बकरियों के स्वास्थ्य, चारे की उपलब्धता और उत्पादन पर असर पड़ रहा है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पशुपालक मौसम के अनुसार वैज्ञानिक पोषण और चारा प्रबंधन अपनाएं तो बकरियों को तापीय तनाव से बचाया जा सकता है. इससे दूध और मांस उत्पादन बेहतर होगा, बीमारियों का खतरा कम होगा और बकरी पालन अधिक लाभदायक बन सकता है.
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही हैं बकरी पालकों की चुनौतियां
केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञ डॉ. वाई. के. सोनी के अनुसार भारत में बकरी पालन छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन परिवारों तथा महिलाओं की आय का प्रमुख स्रोत है. कम लागत और कम जगह में शुरू होने वाला यह व्यवसाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी माना जाता है. लेकिन बदलते मौसम के कारण तापीय तनाव, चारे की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं. इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा असर उन पशुपालकों पर पड़ता है, जो प्राकृतिक चरागाहों और स्थानीय चारे पर निर्भर रहते हैं.
तापीय तनाव से घटता है दूध, वजन और प्रजनन क्षमता
डॉ. वाई. के. सोनी बताते हैं कि जब तापमान और आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है, तब बकरियां अपने शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर नहीं निकाल पातीं. इस स्थिति को तापीय तनाव (हीट स्ट्रेस) कहा जाता है. इसके दौरान बकरियां कम चारा खाती हैं, अधिक पानी पीती हैं, तेजी से सांस लेती हैं और सुस्त दिखाई देती हैं. इसका असर उनके वजन, वृद्धि, दूध उत्पादन और मांस उत्पादन पर पड़ता है. लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे संक्रामक और परजीवी रोगों का खतरा बढ़ जाता है. इससे उपचार का खर्च बढ़ने के साथ पशुपालकों की आय भी प्रभावित होती है.
संतुलित पोषण और वैकल्पिक चारा अपनाना होगा जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार बदलते मौसम में केवल अधिक चारा खिलाना पर्याप्त नहीं है. बकरियों की आयु, शारीरिक अवस्था और उत्पादन क्षमता के अनुसार संतुलित आहार देना जरूरी है. इसके साथ ही स्वच्छ पेयजल, खनिज मिश्रण, विटामिन, गुणवत्तापूर्ण हरा और सूखा चारा नियमित रूप से उपलब्ध कराना चाहिए. सालभर चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए हे (Hay), साइलेज (Silage), सूखा सहन करने वाली चारा फसलें, वृक्षीय चारा, कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक उपयोग, एजोला और अन्य वैकल्पिक चारा स्रोतों को भी अपनाना लाभदायक माना जाता है. इससे चारे की कमी के समय भी पशुओं को पर्याप्त पोषण मिलता है.
वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर बढ़ा सकते हैं मुनाफा
डॉ. वाई. के. सोनी के अनुसार मौसम के अनुरूप बकरी पालन में कुछ आसान वैज्ञानिक उपाय अपनाकर नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. पशुपालकों को बकरियों के लिए पर्याप्त छाया, स्वच्छ पेयजल, नियमित कृमिनाशन, समय पर टीकाकरण और संतुलित आहार की व्यवस्था करनी चाहिए. इससे बकरियों पर तापीय तनाव का प्रभाव कम होता है और उनका स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु-अनुकूल स्मार्ट पोषण और चारा प्रबंधन अपनाने से बकरियों की उत्पादकता और प्रजनन क्षमता में सुधार होता है. साथ ही कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर पशुपालक अपनी आय बढ़ा सकते हैं. बदलते मौसम में यही वैज्ञानिक प्रबंधन भविष्य में बकरी पालन को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और लाभदायक बनाने का सबसे प्रभावी तरीका साबित हो सकता है.