जनवरी की ठंड में मछली को कैसे रखें सुरक्षित? बिहार सरकार ने जारी की जरूरी गाइडलाइन

जनवरी की ठंड मत्स्य-पालन के लिए चुनौती भरी होती है. गिरता तापमान, कोहरा और ठंडा पानी मछलियों की सेहत पर असर डालता है. ऐसे में डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग, बिहार सरकार ने मत्स्य-पालकों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन कर नुकसान से बचा जा सकता है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 2 Jan, 2026 | 04:00 PM

Fish Farming: सर्दी का महीना आते ही मत्स्य-पालकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. जनवरी में तापमान गिरने, कोहरे और ठंडे पानी का सीधा असर मछलियों की सेहत, बढ़वार और उत्पादन पर पड़ता है. ऐसे में अगर समय रहते सही कदम न उठाए जाएं, तो नुकसान तय है. इसी को देखते हुए डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग (मत्स्य प्रभाग), बिहार सरकार ने जनवरी माह के लिए कुछ अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिन्हें अपनाकर मत्स्य-पालक सर्दियों में भी सुरक्षित और लाभकारी उत्पादन कर सकते हैं.

ठंड में आहार और तालाब प्रबंधन सबसे जरूरी

जनवरी में औसत तापमान कई बार 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है. ऐसी स्थिति में मछलियां पूरक आहार  कम या बिल्कुल नहीं खातीं. अगर मछली आहार नहीं ले रही है, तो जबरदस्ती दाना डालना नुकसानदायक हो सकता है. विशेषज्ञों की सलाह है कि ऐसे समय पूरक आहार देना बंद कर देना चाहिए. ठंड के मौसम में तालाब में प्राकृतिक आहार की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है. इसके लिए हर 10 से 15 दिन पर प्रति एकड़ 15 किलो चूना, 15 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट, 5 किलो मिनरल मिक्चर और 50 किलो सरसों या राई की खल्ली (पानी में फुलाकर) घोल बनाकर तालाब में छिड़काव करना लाभदायक होता है.

प्रजनन और रोग से बचाव की सही तैयारी

कॉमन कार्प मछली के बीज उत्पादकों के लिए जनवरी का महीना बेहद अहम है. विभाग के अनुसार, जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी से ब्रीडिंग शुरू करने के लिए 15-20 दिन पहले नर और मादा प्रजनक मछलियों को अलग-अलग तालाबों में रखना चाहिए. ठंड में मछलियों पर आरगुलस जैसे परजीवी संक्रमण का खतरा  बढ़ जाता है. इससे बचाव के लिए जरूरत अनुसार 80-100 एमएल प्रति एकड़ की दर से बुटक्स, क्लिनर या टिनिक्स का छिड़काव सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच करना चाहिए. यह समय दवा के प्रभाव के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है.

फंगस और परजीवी से ऐसे करें बचाव

सर्दियों में मछलियों में फफूंद और परजीवी रोग तेजी से फैलते हैं. इससे बचाव के लिए मत्स्य-पालक प्रति एकड़ 40-50 किलो नमक का घोल  बनाकर तालाब में छिड़काव कर सकते हैं. इसके अलावा VKC-80 फीसदी दवा 1 लीटर प्रति एकड़ की दर से पानी में घोलकर डालना भी प्रभावी माना गया है. अगर तालाब का पानी जरूरत से ज्यादा हरा हो जाए, तो चूना और रासायनिक खाद का इस्तेमाल तुरंत रोक दें. ऐसी स्थिति में 800 ग्राम कॉपर सल्फेट प्रति एकड़ पानी में घोलकर डालना चाहिए.

पानी का स्तर और मौसम का खास ध्यान रखें

ठंड के मौसम में तालाब का पानी गहरा रखना मछलियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है. कार्प मछली वाले तालाब में न्यूनतम 5-6 फीट, जबकि पंगेरियस मछली वाले तालाब में 8-10 फीट पानी बनाए रखना चाहिए. पंगेरियस तालाबों में रोजाना 10-20 प्रतिशत पानी का बदलाव ट्यूबवेल के पानी से करना लाभकारी होता है. अगर तापमान बहुत गिर  जाए या घना कोहरा छाया हो, तो उस समय तालाब में कोई भी गतिविधि-जैसे आहार, चूना, खाद या दवा का छिड़काव-बिल्कुल न करें.

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Published: 2 Jan, 2026 | 04:00 PM

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