India fisheries policy: समुद्र से मिलने वाली मछलियां सिर्फ करोड़ों लोगों की थाली तक ही नहीं पहुंचतीं, बल्कि लाखों मछुआरों की रोजी-रोटी भी इन्हीं पर निर्भर करती है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने और छोटी उम्र की मछलियों के शिकार के कारण समुद्री संसाधनों पर दबाव बढ़ने लगा है. इसी चिंता को देखते हुए केंद्र सरकार ने समुद्री मछलियों को बचाने और भविष्य में टिकाऊ मत्स्य पालन सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा और जरूरी कदम उठाया है.
केंद्र सरकार अब मछलियों के लिए न्यूनतम कानूनी आकार तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, ताकि छोटी और अपरिपक्व मछलियों का शिकार रोका जा सके और समुद्र में मछलियों की संख्या बनी रहे.
राज्यसभा में सरकार का स्पष्ट संदेश
केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और दुग्धपान मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार समुद्री मछली संसाधनों के संरक्षण को लेकर गंभीर है. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में मत्स्य पालन तभी टिकाऊ रह सकता है, जब मछलियों को बढ़ने और प्रजनन का पूरा मौका दिया जाए.
इसी उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत काम कर रहे केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI) ने पोमफ्रेट समेत कई अहम मछली प्रजातियों के लिए न्यूनतम कानूनी आकार की सिफारिश की है.
राज्यों को दिए गए स्पष्ट निर्देश
CMFRI की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किशोर मछलियों के शिकार को रोकने के लिए जाल के आकार और पकड़ के नियम तय करें. केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इस दिशा में पहल करते हुए पोमफ्रेट समेत कई मछलियों के लिए न्यूनतम कानूनी आकार को पहले ही अधिसूचित कर दिया है.
इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मछलियां समुद्र में पर्याप्त समय तक जीवित रहें, प्रजनन करें और उनकी संख्या में गिरावट न आए.
समुद्री मछली स्टॉक की स्थिति राहत देने वाली
सरकार के लिए एक अच्छी खबर यह भी है कि भारत के समुद्री मछली भंडार की स्थिति अभी काफी हद तक संतोषजनक है. ICAR-CMFRI की ‘मरीन फिश स्टॉक स्टेटस (MFSS) रिपोर्ट 2022’ के अनुसार, देश के करीब 91.1 प्रतिशत समुद्री मछली स्टॉक स्वस्थ स्थिति में हैं. यह आकलन वर्ष 2023 तक के आंकड़ों के आधार पर किया गया है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति बदल भी सकती है.
पारंपरिक मछुआरों के हितों की सुरक्षा
सरकार ने यह भी साफ किया है कि संरक्षण के साथ-साथ पारंपरिक मछुआरों के अधिकारों की रक्षा भी उसकी प्राथमिकता है. तटीय राज्यों में लागू समुद्री मत्स्य पालन विनियमन अधिनियम (MFRA) के तहत कुछ समुद्री क्षेत्र केवल पारंपरिक, गैर-यांत्रिक या छोटे मोटर चालित नौकाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं.
कई राज्यों ने इन क्षेत्रों में बड़ी यंत्रीकृत नावों और ट्रॉलरों के प्रवेश पर रोक लगा दी है, ताकि छोटे मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रह सके.
सिल्वर पोमफ्रेट पर खास ध्यान
सिल्वर पोमफ्रेट की घटती संख्या को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने इसे राज्य मछली का दर्जा दिया है. इसके साथ ही प्रजनन क्षेत्रों में इस मछली की सुरक्षा के लिए इसका न्यूनतम कानूनी आकार 135 से 140 मिलीमीटर तय किया गया है. इससे यह सुनिश्चित होगा कि छोटी मछलियां पकड़ में न आएं.
हानिकारक तकनीकों पर सख्ती
भारत सरकार ने समुद्र में मछली पकड़ने की कुछ विनाशकारी तकनीकों पर भी सख्त प्रतिबंध लगाया है. विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में बुल या पेयर ट्रॉलिंग और LED लाइट के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है. राज्यों को भी अपने प्रादेशिक जल में ऐसे नियम लागू करने की सलाह दी गई है.
इसके अलावा, मछलियों के प्रजनन काल को सुरक्षित रखने के लिए पूर्वी और पश्चिमी तट पर हर साल 61 दिनों का मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लागू किया जाता है.
प्रतिबंध के दौरान मछुआरों को आर्थिक मदद
सरकार ने मछुआरों की आर्थिक चिंता को भी ध्यान में रखा है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत प्रतिबंध अवधि के दौरान पारंपरिक मछुआरा परिवारों को आर्थिक सहायता दी जाती है. हर लाभार्थी को सालाना 3,000 रुपये की सहायता मिलती है और तीन महीने की प्रतिबंध अवधि में कुल 4,500 रुपये की राशि जारी की जाती है.
कृत्रिम प्रवाल भित्तियों से बढ़ेगी मछलियों की संख्या
समुद्री जैव विविधता को बढ़ाने के लिए सरकार तटीय इलाकों में कृत्रिम प्रवाल भित्तियां भी स्थापित करवा रही है. इससे मछलियों को सुरक्षित आवास मिलेगा और पारंपरिक मछुआरों के क्षेत्रों में मछलियों की उपलब्धता बढ़ेगी.