फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ने सेब किसानों की बढ़ाई चिंता, कारोबार प्रभावित होने का है डर

हिमाचल और कश्मीर के सेब उत्पादक मुक्त व्यापार समझौते और विदेशी सेब की आपूर्ति से चिंतित हैं. पहाड़ी और छोटे बाग, मजदूर कमी, स्टोरेज की कमी और अस्थिर बाजार ने स्थिति और कठिन बना दी है. स्थानीय किसानों की मदद के लिए नीति, सब्सिडी और संरचना सुधार जरूरी है.

Kisan India
नोएडा | Published: 11 Feb, 2026 | 11:00 PM

Agricultural Trade Deal: भारत के न्यूजीलैंड, यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) हिमाचल और कश्मीर के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा रहे हैं. पहले से ही बदलते मौसम, बढ़ती लागत और अस्थिर बाजार के दबाव में ये किसान अब विदेशी सेब की बड़ी आपूर्ति से प्रभावित हो रहे हैं. ईरान और तुर्की से सेब की भारी आवक ने पहले ही स्थानीय सेब की कीमतों को नुकसान पहुंचाया था और अब नए FTAs से चल रहे बाजार में भी कीमतें गिरने की संभावना है.

दरअसल, विदेशों में सेब उद्योग अत्यधिक विकसित है. सरकार की नीतियों, सब्सिडी और प्रोत्साहनों का समर्थन मिलता है और आधुनिक तकनीक व उच्च उत्पादन वाली किस्मों के कारण उत्पादन भी अधिक होता है. उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड में औसत उत्पादन 52 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि हिमाचल में 9-10 टन और कश्मीर में 12-16 टन प्रति हेक्टेयर है. हालांकि हिमाचल को ‘भारत का सेब कटोरा’ कहा जाता है. लेकिन राज्य में बागवानी  पर कोई दीर्घकालीन नीति नहीं है. बागवानी मंत्री ने कहा कि हमारे पास नीति बनाने के लिए बजट नहीं है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह बजट उपलब्ध कराकर बागवानी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए नीति बनाए, जो राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है?

बड़े पैमाने पर मशीनों का इस्तेमाल मुश्किल

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल और कश्मीर में बड़े पैमाने पर मशीनों का इस्तेमाल मुश्किल है. क्योंकि इलाके पहाड़ी और अनुकूल नहीं हैं और भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी हुई है. हम अपने बागों में काम चलाने के लिए नेपाल से आने वाले मजदूरों पर निर्भर हैं. लेकिन अब मजदूरों की कमी शुरू हो गई है, क्योंकि नेपाली मजदूर अधिक कमाई के लिए मध्य पूर्व और अन्य देशों का रुख कर रहे हैं.

विश्व बैंक फंडिंग वाली योजना शुरू की थी

साथ ही हिमाचल-कश्मीर में पोस्ट-हार्वेस्ट स्टोरेज और मूल्य संवर्धन (वैल्यू ऐडिशन) की सुविधाओं की कमी है. इसके कारण 85-90 प्रतिशत ताजा उत्पादन सीधे चलती मंडी में बेचना पड़ता है, जिससे आपूर्ति अधिक होने पर कीमतें उत्पादन लागत  से भी नीचे गिर जाती हैं. करीब दस साल पहले राज्य सरकार ने 1,124 करोड़ रुपये की विश्व बैंक फंडिंग वाली योजना शुरू की थी. इस परियोजना में क्लोनल रूटस्टॉक, हाई कलर स्ट्रेन और नई किस्में पेश की गईं. लेकिन सरकारी पौधों का इस्तेमाल करने वाले कुछ ही बागों में मुनाफा हुआ. इसके पीछे मुख्य कारण M9 रूटस्टॉक पर जोर देना था, जिस पर स्पर किस्मों का ग्राफ्ट किया गया था. हमारी परिस्थितियों में स्पर किस्में ठीक से नहीं फलतीं क्योंकि पुराने बागों में मिट्टी की पोषण क्षमता कम है और सिंचाई पर्याप्त नहीं है. इसके बजाय M111 और जेनिवा सीरीज के अन्य मजबूत रूटस्टॉक को बढ़ावा देना चाहिए था.

 

 

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Published: 11 Feb, 2026 | 11:00 PM

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