Jalori Camel: रेगिस्तान की जिंदगी आसान नहीं होती. तेज धूप, रेत के लंबे मैदान और पानी की कमी-इन सबके बीच जो जानवर सबसे भरोसेमंद साथी बनकर खड़ा रहता है, वह है ऊंट. खासकर राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में पाया जाने वाला जालोरी ऊंट अपनी ताकत और सहनशीलता के लिए जाना जाता है. यह ऊंट न सिर्फ परिवहन का साधन है, बल्कि ग्रामीण परिवारों की कमाई का एक मजबूत सहारा भी है. बदलते समय में भी इसकी उपयोगिता कम नहीं हुई है.
रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों का साथी
पशुपालन विभाग के अनुसार, जालोरी ऊंट को खास तौर पर रेगिस्तानी इलाकों के लिए उपयुक्त माना जाता है. यह नस्ल कम पानी और कम चारे में भी लंबे समय तक काम कर सकती है. जहां दूसरे पशु जल्दी थक जाते हैं, वहीं यह ऊंट लगातार कई किलोमीटर तक चल सकता है. रेत पर संतुलन बनाए रखने की इसकी क्षमता इसे रेगिस्तान का सबसे भरोसेमंद पशु बनाती है. यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग इसे यात्रा और सामान ढोने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
परिवहन और खेती में उपयोगी
राजस्थान के कई गांवों में जालोरी ऊंट आज भी परिवहन का महत्वपूर्ण साधन है. यह ऊंट भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद करता है. खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां सड़क या वाहन की सुविधा कम होती है, वहां इसकी भूमिका और बढ़ जाती है. इसके अलावा खेती के कामों में भी इसका उपयोग किया जाता है. खेत की जुताई, पानी खींचने और अन्य ग्रामीण कार्यों में यह ऊंट किसानों का काम आसान बनाता है. कम खर्च में ज्यादा काम करने की वजह से पशुपालक इसे लाभदायक मानते हैं.
मजबूत शरीर और संतुलित चाल इसकी पहचान
जालोरी ऊंट की शारीरिक बनावट इसे दूसरी नस्लों से अलग बनाती है. इसका शरीर मजबूत होता है और गर्दन लंबी होती है. इसकी चाल संतुलित और स्थिर होती है, जिससे यह रेत पर आसानी से चल सकता है. कठिन मौसम में भी काम करने की क्षमता इस नस्ल की सबसे बड़ी खासियत है. तेज गर्मी और सूखे वातावरण में भी यह ऊंट सक्रिय रहता है. यही कारण है कि इसे रेगिस्तानी जीवन के लिए आदर्श पशु माना जाता है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत सहारा
जालोरी ऊंट सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय का जरिया भी है. कई पशुपालक ऊंट पालन से अपनी आजीविका चलाते हैं. परिवहन सेवाओं, खेती के काम और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों में इसका उपयोग कर लोग कमाई करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऊंट पालन को बढ़ावा दिया जाए और पशुपालकों को प्रशिक्षण व बाजार की सुविधा मिले, तो यह एक अच्छा व्यवसाय बन सकता है. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और पारंपरिक पशुपालन को भी नई पहचान मिलेगी.