Dairy Farming : जनवरी का महीना आते ही ठंड अपना असली रंग दिखाने लगती है. पहाड़ों में बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है, तो मैदानी इलाकों में घना कोहरा और गलन लोगों की मुश्किलें बढ़ा देती है. ऐसे मौसम में सबसे ज्यादा असर पशुधन और मछली पालन पर पड़ता है. ठंड के कारण पशु कमजोर होने लगते हैं, दूध कम देने लगते हैं और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. अगर इस समय सही देखभाल न की जाए, तो पशुपालकों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है. इसलिए जनवरी में पशुओं और मछलियों की देखभाल को लेकर सतर्क रहना बेहद जरूरी है.
ठंड से बचाव नहीं किया तो घटेगा उत्पादन
सर्दियों में पशुओं को ठंड से बचाना सबसे पहली जरूरत होती है. ठंडी हवा, कोहरा और बर्फबारी से पशु तनाव में आ जाते हैं, जिससे उनका दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है. इस मौसम में पशुओं को गुनगुना पानी पिलाना, रात में ठंड से बचाने के लिए बोरे या मोटे कपड़े से ढंकना और गौशाला के फर्श पर सूखी घास या पुआल बिछाना फायदेमंद रहता है. साथ ही खली और गुड़ का मिश्रण देने से शरीर में गर्मी बनी रहती है. गौशाला में ठंडी हवा को रोकने के लिए दरवाजे और खिड़कियों को रात के समय ढंक देना चाहिए, ताकि पशु आराम से रह सकें और दूध उत्पादन पर ठंड का असर न पड़े.
बंद गौशालाओं से बढ़ सकती हैं बीमारियां
लगातार बारिश या बर्फबारी के दौरान पशुओं को लंबे समय तक गौशाला के अंदर रखना कई बार नुकसानदायक भी हो सकता है. अगर गौशाला में हवा के आने-जाने की सही व्यवस्था न हो, तो अंदर जहरीली गैसें जमा हो जाती हैं. इससे पशुओं को सांस की बीमारी, खांसी और निमोनिया जैसी दिक्कत हो सकती है. इसलिए ठंड से बचाव के साथ-साथ वेंटिलेशन का भी ध्यान रखना जरूरी है. पशुओं के व्यवहार और सेहत पर रोज नजर रखें. अगर भूख कम लगे, सुस्ती दिखे या सांस लेने में परेशानी हो, तो तुरंत इलाज करवाएं.
जनवरी में बढ़ता है संक्रामक रोगों का खतरा
सर्दियों के मौसम में कई संक्रामक रोग तेजी से फैलते हैं. भेड़-बकरी और मवेशियों में इस समय बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है. ठंड के कारण पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे संक्रमण जल्दी पकड़ लेता है. ऐसे में समय पर टीकाकरण कराना और साफ-सफाई का खास ध्यान रखना बहुत जरूरी है. गौशाला को सूखा और साफ रखें, बाहर से आने वाले नए पशुओं को कुछ समय अलग रखें और जैव-सुरक्षा नियमों का पालन करें, ताकि बीमारी फैलने से रोकी जा सके.
मछली पालकों को भी बरतनी होगी सावधानी
जनवरी का महीना मछली पालन के लिए भी संवेदनशील होता है. ठंड में तालाब का पानी बहुत ठंडा हो जाता है, जिससे मछलियां सुस्त हो जाती हैं. ऐसे में तालाब की गहराई कम से कम छह फीट रखना जरूरी होता है, ताकि मछलियों को गर्म पानी वाले हिस्से में शीतनिद्रा का मौका मिल सके. शाम के समय नलकूप से थोड़ा पानी डालने पर सतह का तापमान कुछ हद तक बढ़ाया जा सकता है. इसके साथ ही तालाब के बांधों की मरम्मत, नर्सरी की तैयारी और प्रजनन के लिए मछलियों का चयन भी इसी समय कर लेना चाहिए.
किसानों से अपील
पशुपालकों और मछली पालकों के लिए जरूरी है कि वे अपने क्षेत्र की जलवायु और हालात के अनुसार सही जानकारी लें. नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क बनाए रखें और समय-समय पर मिलने वाली सलाह को अपनाएं. सही देखभाल और सतर्कता से जनवरी की कड़ाके की ठंड में भी पशु स्वस्थ रहेंगे, दूध उत्पादन बना रहेगा और मछली पालन में भी नुकसान से बचा जा सकेगा.