Animal husbandry: मॉनसून के मौसम में नेपियर घास, ज्वार, मक्का और अन्य हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है. यह चारा पशुओं के लिए पौष्टिक माना जाता है और दूध उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक होता है. हालांकि पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK नोएडा) के अनुसार, हरे चारे को सही तरीके से खिलाना बेहद जरूरी है. यदि पशुओं को गीला, ओस से भीगा या सड़ा-गला चारा दिया जाए तो इससे पेट फूलना, गैस बनना, दस्त और पाचन संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए हरे चारे के उपयोग में थोड़ी सावधानी बरतकर पशुओं को स्वस्थ रखा जा सकता है और दुग्ध उत्पादन भी बेहतर बनाया जा सकता है.
गीला या ओस से भीगा चारा सीधे न खिलाएं
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK नोएडा) के अनुसार, बारिश या ओस से भीगा हुआ हरा चारा पशुओं को सीधे नहीं खिलाना चाहिए. ऐसे चारे में नमी अधिक होने के कारण पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है. बेहतर होगा कि हरे चारे को कुछ समय के लिए धूप या हवादार स्थान पर फैला दिया जाए, ताकि अतिरिक्त नमी निकल जाए. इसके बाद इसे सूखे भूसे या सूखे चारे के साथ मिलाकर खिलाना चाहिए. इससे पाचन बेहतर रहता है और पशुओं में गैस या अफरा जैसी समस्याओं का खतरा कम हो जाता है.
चारे की सफाई और संतुलित आहार का रखें ध्यान
हरे चारे को खिलाने से पहले साफ पानी से धोना चाहिए ताकि उस पर लगी मिट्टी, कीटनाशकों के अवशेष या अन्य अशुद्धियां हट जाएं. इसके बाद चारे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खिलाना अधिक लाभकारी माना जाता है. सड़ा-गला, फफूंद लगा या खराब चारा पशुओं को बिल्कुल नहीं देना चाहिए. संतुलित आहार के लिए पशुओं के भोजन में लगभग 60 प्रतिशत हरा चारा और 40 प्रतिशत सूखा चारा शामिल करना उपयुक्त माना जाता है. इसके साथ ही प्रत्येक दो लीटर दूध उत्पादन पर लगभग एक किलोग्राम दाना मिश्रण देना चाहिए. आहार में प्रतिदिन लगभग 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर और आवश्यक मात्रा में नमक शामिल करने से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है.
ज्वार खिलाते समय रखें विशेष सावधानी
विशेषज्ञों के अनुसार ज्वार का चारा हमेशा तब खिलाना चाहिए जब उसमें फूल आ चुके हों. बहुत कम उम्र की ज्वार में हाइड्रोसायनिक एसिड बनने की संभावना रहती है, जो पशुओं के लिए विषैला साबित हो सकता है. इसलिए अधपकी या छोटी ज्वार खिलाने से बचना चाहिए. इसी तरह हरे चारे में विविधता बनाए रखना भी जरूरी है ताकि पशुओं को सभी आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिल सकें.
स्वच्छ पानी और नियमित देखभाल से रहेंगी बीमारियां दूर
संतुलित आहार के साथ पशुओं को हर समय स्वच्छ और पर्याप्त मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध कराना आवश्यक है. समय पर टीकाकरण, नियमित रूप से कीड़ों की दवा देना और पशुशाला की साफ-सफाई बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इन उपायों से थनैला, खुरपका-मुंहपका तथा अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान हरे चारे के सही प्रबंधन और संतुलित पोषण पर ध्यान दें, तो पशु स्वस्थ रहेंगे, दूध उत्पादन में वृद्धि होगी और पशुपालन से होने वाली आय भी बेहतर हो सकेगी.