Dairy Farming : गांव की सुबह, गौशाला से आती घंटी की आवाज और दूध से भरी बाल्टी-मध्य प्रदेश की यही पहचान अब और मजबूत होने जा रही है. 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने किसानों और पशुपालकों के लिए ऐसा ऐलान किया, जिसने पूरे राज्य में उम्मीद की नई लहर दौड़ा दी. सरकार ने न सिर्फ मध्य प्रदेश को देश की ‘दुग्ध राजधानी’ बनाने का संकल्प लिया है, बल्कि वर्ष 2026 को किसान कल्याण वर्ष के रूप में मनाने का भी फैसला किया है.
दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार का ठोस प्लान
मुख्यमंत्री के ऐलान के पीछे सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि एक पूरा रोडमैप है. राज्य सरकार पहले से ही डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना के जरिए दूध उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रही है. इस योजना के तहत पशुपालकों को 25 दुधारू पशुओं की एक यूनिट बनाने का मौका दिया जा रहा है. यह योजना खास तौर पर उन लोगों के लिए है, जो डेयरी को छोटे या मध्यम स्तर पर शुरू करना चाहते हैं, लेकिन पूंजी की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं.
योजना का मकसद- रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता
सरकार का साफ कहना है कि डेयरी सिर्फ दूध बेचने का काम नहीं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का जरिया है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य है- ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए मौके पैदा करना, पशुपालकों की आमदनी बढ़ाना और राज्य को दुग्ध उत्पादन में आगे लाना. डेयरी फार्म खुलने से सिर्फ मालिक ही नहीं, बल्कि चारा सप्लाई, परिवहन और प्रोसेसिंग से जुड़े कई लोगों को भी काम मिलेगा.
- पशुपालकों के लिए रोजगार का नया मौका, केवल दूध ही नहीं ऊंट के आंसुओं से भी होगी कमाई
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सब्सिडी ने आसान किया डेयरी बिजनेस
योजना का सबसे आकर्षक हिस्सा है सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद. अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लाभार्थियों को कुल परियोजना लागत का 33 फीसदी तक अनुदान दिया जा रहा है. वहीं अन्य वर्गों के लिए यह सहायता 25 फीसदी तक है. बाकी राशि बैंक लोन के जरिए उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे बड़े निवेश का डर काफी हद तक खत्म हो जाता है. खास बात यह है कि एक आवेदक अधिकतम 8 यूनिट यानी 200 पशुओं तक की डेयरी परियोजना के लिए आवेदन कर सकता है.
आवेदन प्रक्रिया और जरूरी शर्तें
योजना में पारदर्शिता पर खास ध्यान दिया गया है. आवेदन के लिए आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, भूमि दस्तावेज, बैंक खाता विवरण, जाति प्रमाण पत्र (यदि लागू हो) और प्रशिक्षण प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी होंगे. एक अहम शर्त यह भी है कि प्रति यूनिट के लिए पशुपालक के पास कम से कम 3.50 एकड़ जमीन होनी चाहिए, ताकि पशुओं के आवास और चारे की सही व्यवस्था हो सके. इच्छुक लोग पशुपालन एवं डेयरी विभाग के पोर्टल या अपने जिले के पशु चिकित्सा कार्यालय से जानकारी ले सकते हैं.
गोवंश संरक्षण पर भी सरकार का फोकस
सरकार सिर्फ दूध उत्पादन ही नहीं, बल्कि गोवंश की देखभाल पर भी गंभीर है. लावारिस गोवंश के लिए गोशालाओं में प्रति गाय अनुदान 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये प्रतिदिन कर दिया गया है. इसके अलावा गोशालाओं के लिए बजट को 250 करोड़ से बढ़ाकर 505 करोड़ रुपये किया जा रहा है. राज्य की करीब 3000 गोशालाओं में इस समय लगभग 5 लाख गोवंश की देखभाल की जा रही है.