Indigenous Cow: देश में दूध की बढ़ती मांग ने किसानों और पशुपालकों का रुझान तेजी से डेयरी फार्मिंग की तरफ बढ़ाया है. पहले जहां ज्यादातर लोग भैंस पालन को ज्यादा फायदे का सौदा मानते थे, वहीं अब देशी गायों की कुछ खास नस्लें भैंसों को भी कड़ी टक्कर दे रही हैं. कम खर्च, कम बीमारी और अच्छा दूध उत्पादन इन्हें पशुपालकों की पहली पसंद बना रहा है. KVK के पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार अगर सही नस्ल चुनकर संतुलित आहार, साफ शेड और समय पर टीकाकरण किया जाए, तो देशी गायों से भी शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है. यही वजह है कि आज कई किसान भैंस की जगह साहीवाल, गिर और हरियाणा नस्ल की गायों को अपना रहे हैं. देशी नस्लों को बढ़ावा देने के लिए सरकार भी राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाओं पर जोर दे रही है.
साहीवाल गाय- कम खर्च में ज्यादा दूध की भरोसेमंद नस्ल
कुंवर घनश्याम के अनुसार, साहीवाल देश की सबसे बेहतर दूध देने वाली देशी नस्लों में गिनी जाती है. यह गर्मी और मौसम के बदलाव को आसानी से सहन कर लेती है, इसलिए उत्तर भारत के किसानों के लिए काफी फायदेमंद है. सही देखभाल और अच्छे चारे पर यह रोजाना 15 से 25 लीटर तक दूध दे सकती है. इसका स्वभाव शांत होता है और बीमारी का खतरा भी दूसरी नस्लों के मुकाबले कम रहता है. यही कारण है कि छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए यह नस्ल काफी मुनाफे वाली साबित होती है. आज पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और यूपी के कई डेयरी फार्म में साहीवाल तेजी से लोकप्रिय हो रही है.
गिर गाय- A2 दूध और बेहतर कमाई का शानदार विकल्प
गुजरात के गिर क्षेत्र से जुड़ी गिर नस्ल अपनी अलग पहचान रखती है. इसके लंबे कान, मजबूत शरीर और शांत स्वभाव इसे खास बनाते हैं. KVK विशेषज्ञ के अनुसार गिर गाय रोजाना 10 से 20 लीटर तक दूध दे सकती है और इसका दूध A2 क्वालिटी के कारण बाजार में बेहतर दाम दिलाता है. आजकल शहरों में A2 दूध की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे पशुपालकों को सीधा फायदा मिल रहा है. गिर नस्ल की खासियत यह भी है कि यह गर्म इलाकों में भी अच्छी तरह रहती है और लंबे समय तक उत्पादन देती है. इसलिए कम लागत में अच्छी आमदनी चाहने वाले डेयरी किसानों के लिए यह बढ़िया विकल्प है.
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हरियाणा नस्ल- दूध के साथ खेतों में भी काम की साथी
हरियाणा नस्ल की गाय को किसान बहुउपयोगी मानते हैं. यह नस्ल दूध देने के साथ खेतों के काम में भी उपयोगी मानी जाती है. कुंवर घनश्याम के मुताबिक यह रोज 10 से 15 लीटर तक दूध दे सकती है. इसका शरीर मजबूत होता है और यह देसी मौसम में जल्दी ढल जाती है. जिन किसानों के पास खेती और पशुपालन दोनों हैं, उनके लिए यह नस्ल ज्यादा फायदेमंद रहती है. हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी यूपी में यह नस्ल लंबे समय से किसानों की पसंद रही है. इसकी देखभाल भी अपेक्षाकृत आसान है, इसलिए छोटे पशुपालक भी इसे आसानी से पाल सकते हैं.
गोकुल योजना और आधुनिक तकनीक से बढ़ेगा दूध उत्पादन
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम का कहना है कि सिर्फ नस्ल चुनना ही काफी नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक अपनाना भी जरूरी है. सरकार की राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना 2014 से देशी नस्लों के संरक्षण और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए काम कर रही है. इस योजना के तहत कृत्रिम गर्भाधान, सेक्स-सॉर्टेड सीमेन और IVF जैसी तकनीकों से बेहतर बछिया तैयार की जा रही हैं. इससे छोटे किसानों को भी अच्छी नस्ल के पशु मिल रहे हैं और डेयरी से उनकी आय बढ़ रही है. अगर पशुपालक सही नस्ल, संतुलित चारा, साफ पानी और समय पर डॉक्टर की सलाह अपनाएं, तो भैंस की तरह देशी गायों से भी शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है.