उर्वरक सब्सिडी बनी प्राकृतिक खेती की राह में रुकावट ? PM मोदी के इस बयान से छिड़ी नई बहस

सरकार किसानों को 3000 रुपये तक की यूरिया करीब 300 रुपये में उपलब्ध करा रही है, जिससे खेती की लागत कम हो रही है. वहीं सरकार प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सस्ती रासायनिक खाद किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने से दूर रख रही है?

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 4 Jul, 2026 | 04:42 PM

3000 रुपये की खाद सिर्फ 300 रुपये में मिलना किसानों के लिए बड़ी राहत है, लेकिन क्या यही सब्सिडी प्राकृतिक खेती के मिशन की रफ्तार धीमी कर रही है? सरकार एक ओर रासायनिक उर्वरकों पर भारी सब्सिडी देकर किसानों का खर्च कम कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील भी कर रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सस्ती रासायनिक खाद की उपलब्धता किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने से रोक रही है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान के बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है.

वैश्विक संकट से बढ़ी खाद की चुनौती

राजस्थान के पचपदरा (Rajasthan) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  (PM Modi) ने कहा कि दुनिया में युद्ध और अशांति का सीधा असर किसानों पर भी पड़ता है. उन्होंने बताया कि पश्चिमी एशिया में जारी संकट और उससे पहले यूक्रेन युद्ध के कारण पूरी दुनिया में उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित हुई. कई देशों में खाद की कमी हो गई और कीमतें तेजी से बढ़ीं. पीएम मोदी के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की एक बोरी 3000 रुपये से भी अधिक कीमत पर पहुंच गई थी. ऐसे हालात में भारत के किसानों को राहत देना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी.

300 रुपये में यूरिया, सरकार का बड़ा राहत पैकेज

प्रधानमंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी होने के बावजूद भारत सरकार ने किसानों को यूरिया की बोरी  लगभग 300 रुपये में उपलब्ध कराई. इसके लिए सरकार को भारी सब्सिडी देनी पड़ी और खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए गए. उनका कहना था कि यदि यह सहायता नहीं दी जाती तो खेती की लागत काफी बढ़ जाती और इसका सीधा असर किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता. इसके साथ ही केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी कई मंचों से कह चुके हैं कि सरकार किसानों को हजारों रुपये कीमत वाली खाद बेहद कम दाम पर उपलब्ध करा रही है, ताकि खेती का खर्च नियंत्रित रहे और उत्पादन प्रभावित न हो.

खाद की आपूर्ति बनाए रखने के लिए उठाए गए कदम

प्रधानमंत्री ने बताया कि वैश्विक संकट के दौरान सरकार ने सिर्फ सब्सिडी देने तक खुद को सीमित नहीं रखा. भारत ने दूसरे देशों से खाद खरीदने  के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे और विदेशों में भारतीय दूतावासों को भी इस दिशा में विशेष जिम्मेदारी सौंपी. इसके साथ ही घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया गया, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो और किसानों को समय पर उर्वरक मिलता रहे. सरकार का दावा है कि इन प्रयासों की वजह से देश में खाद की उपलब्धता बनी रही और किसानों को बुवाई तथा फसल प्रबंधन के दौरान किसी बड़े संकट का सामना नहीं करना पड़ा.

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, लेकिन उठ रहे हैं सवाल

एक तरफ सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों पर भारी सब्सिडी भी जारी है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि प्राकृतिक खेती भविष्य की जरूरत है और इससे मिट्टी की सेहत सुधरेगी, खेती की लागत घटेगी  तथा पर्यावरण को भी लाभ मिलेगा. हालांकि, कृषि क्षेत्र के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जब रासायनिक खाद किसानों को बेहद सस्ती मिलेगी, तो उनके लिए प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से बढ़ना आसान नहीं होगा. उनका तर्क है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए शुरुआती समय में किसानों को अतिरिक्त मेहनत और नए तरीकों की जरूरत होती है. ऐसे में सस्ती रासायनिक खाद का विकल्प उनके फैसले को प्रभावित कर सकता है.

किसानों की राहत और दीर्घकालिक नीति के बीच संतुलन की चुनौती

फिलहाल सरकार का कहना है कि किसानों को तत्काल राहत देना और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना दोनों समानांतर लक्ष्य हैं. एक ओर सब्सिडी से खेती की लागत कम  रखी जा रही है, तो दूसरी ओर प्राकृतिक खेती, जैविक विकल्पों और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या रासायनिक खाद पर जारी भारी सब्सिडी और प्राकृतिक खेती का अभियान एक साथ समान गति से आगे बढ़ सकते हैं?

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 4 Jul, 2026 | 04:42 PM

लेटेस्ट न्यूज़