Jammu Kashmir rainfall deficit: जम्मू-कश्मीर में इस बार सर्दी अपने साथ एक अलग तरह की चिंता लेकर आई है. आमतौर पर यह मौसम बर्फबारी और बारिश के लिए जाना जाता है, जो न सिर्फ ठंड बढ़ाती है बल्कि खेतों, बागानों और जल स्रोतों के लिए जीवनरेखा भी बनती है. लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं. सर्दियों के बीच लंबे सूखे दौर ने किसानों, बागवानों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. मौसम विभाग के ताजा आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में इस सर्दी बारिश और बर्फबारी सामान्य से काफी कम हुई है, जिसका असर आने वाले महीनों में और गहराने की आशंका है.
सामान्य से काफी कम रही सर्दियों की बारिश
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर में कुल 77.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई. यह आंकड़ा सामान्य औसत 127.7 मिलीमीटर से करीब 39 प्रतिशत कम है. यानी सर्दियों के शुरुआती महीनों में जो बारिश और बर्फबारी होनी चाहिए थी, वह इस बार नहीं हो सकी. विशेषज्ञों का कहना है कि यह कमी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी असर देखने को मिल सकते हैं.
कश्मीर घाटी में हालात ज्यादा गंभीर
कश्मीर घाटी के कई जिलों में बारिश की कमी और भी ज्यादा रही है. राजधानी श्रीनगर में सिर्फ 53.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से लगभग 51 प्रतिशत कम है. दक्षिण कश्मीर के शोपियां और कुलगाम जैसे जिलों में स्थिति और चिंताजनक है, जहां बारिश की कमी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा दर्ज की गई. उत्तरी कश्मीर के बारामुला, बांदीपोरा और गांदरबल में भी सामान्य से काफी कम बारिश हुई है. इन इलाकों में सर्दियों के दौरान तापमान पहले ही काफी नीचे चला जाता है और कई जगह रात का तापमान शून्य डिग्री के आसपास या उससे नीचे रहता है, लेकिन नमी की कमी ने ठंड के बावजूद जमीन को सूखा बनाए रखा है.
जम्मू संभाग और लद्दाख में भी सूखे का असर
चिनाब और पीर पंजाल क्षेत्र में भी बारिश की भारी कमी दर्ज की गई है. किश्तवाड़ जैसे इलाकों में 70 प्रतिशत से ज्यादा बारिश की कमी सामने आई है. रामबन और उधमपुर में भी हालात सामान्य से खराब रहे. हालांकि पुंछ एकमात्र जिला रहा, जहां सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई. वहीं लद्दाख क्षेत्र में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है. लेह और करगिल जैसे ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में नाममात्र की बारिश हुई है. यहां पहले से ही सर्दियों में तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है, और अब बर्फबारी की कमी से पानी के स्रोतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
क्यों नहीं आई बारिश और बर्फबारी
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं रहे. आमतौर पर यही मौसम प्रणालियां सर्दियों में जम्मू-कश्मीर में बारिश और बर्फबारी लेकर आती हैं. इनके कमजोर रहने की वजह से लंबे समय तक सूखे जैसे हालात बने रहे. मौसम विभाग ने फिलहाल जनवरी के मध्य तक किसी बड़े सिस्टम के आने की संभावना भी कम जताई है.
खेती और बागवानी पर गहराता संकट
बारिश और बर्फबारी की कमी का सबसे सीधा असर खेती और बागवानी पर पड़ रहा है. पुलवामा और शोपियां जैसे इलाकों के केसर और सेब उत्पादक किसानों का कहना है कि नमी की कमी से फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है. केसर की फसल को इन महीनों में पर्याप्त नमी की जरूरत होती है, जबकि सेब के लिए ठंड और बर्फ से मिलने वाले ‘चिलिंग आवर्स’ बेहद अहम होते हैं. बर्फ न पड़ने से पेड़ों पर इसका असर अगले सीजन में दिख सकता है.
पानी और पर्यावरण को लेकर बढ़ी चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक बर्फ प्राकृतिक जल भंडार की तरह काम करती है. सर्दियों में जमा हुई बर्फ वसंत और गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलकर नदियों, झीलों और भूजल को पानी देती है. अगर बर्फबारी नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता कम हो सकती है. इससे खेती, पीने के पानी और पर्यावरण के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है.
मौसम विभाग का कहना है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है, लेकिन फिलहाल बड़ी राहत की उम्मीद कम है. सर्दियों के बीच यह सूखा दौर जम्मू-कश्मीर के लिए एक चेतावनी की तरह है. अगर आने वाले हफ्तों में बारिश और बर्फबारी नहीं हुई, तो इसका असर सिर्फ इस मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अगले कृषि और बागवानी सीजन पर भी साफ दिखाई देगा.