Tomato price crash: महाराष्ट्र के जालना जिले से सामने आई एक घटना ने किसानों की बदहाल स्थिति को फिर से उजागर कर दिया है. यहां एक किसान को अपनी मेहनत से उगाई गई पूरी फसल सड़क किनारे फेंकनी पड़ी, क्योंकि उसे बाजार में इतना कम दाम मिला कि लागत भी नहीं निकल पा रही थी. यह घटना सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे कृषि तंत्र की कमजोरी को दिखाती है.
मेहनत और उम्मीद, लेकिन बाजार ने तोड़ा भरोसा
NDTV की खबर के अनुसार, जालना जिले के धरकल्याण गांव के किसान अमर काकड़े ने अपने एक एकड़ खेत में टमाटर की खेती की थी. उन्होंने बीज, खाद, पानी और मजदूरी पर अच्छी-खासी रकम खर्च की थी. फसल तैयार होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि बाजार में अच्छा भाव मिलेगा और उनकी मेहनत रंग लाएगी.
लेकिन जब वह करमाड़ मंडी पहुंचे, तो व्यापारियों ने उन्हें सिर्फ 4 रुपये प्रति किलो का दाम दिया. यह सुनकर किसान हैरान रह गया, क्योंकि इतनी कीमत में तो परिवहन और खेती की लागत भी नहीं निकल सकती थी.
मजबूरी में लिया दर्दनाक फैसला
जब किसान को लगा कि फसल बेचने से उसे सिर्फ नुकसान ही होगा, तो उसने एक बड़ा फैसला लिया. उसने करीब 25 क्विंटल टमाटर जालना-छत्रपति संभाजीनगर हाईवे के पास पुल के नीचे फेंक दिए. यह दृश्य सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उस मानसिक पीड़ा को भी दिखाता है, जिससे किसान गुजरते हैं. महीनों की मेहनत एक पल में बेकार चली गई.
मिडिल ईस्ट संकट का सीधा असर
इस पूरे मामले के पीछे अंतरराष्ट्रीय हालात भी बड़ी वजह बनकर सामने आए हैं. मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण भारत से कृषि उत्पादों का निर्यात प्रभावित हुआ है. टमाटर की विदेशी मांग घट गई है, जिससे देश के अंदर ही ज्यादा सप्लाई हो गई. जब बाजार में माल ज्यादा होता है और खरीदार कम होते हैं, तो कीमतें तेजी से गिरती हैं. यही स्थिति टमाटर के साथ भी देखने को मिल रही है.
जल्दी खराब होने वाली फसल, बढ़ती मुश्किल
टमाटर जैसी फसल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता. किसान के पास सीमित समय होता है, जिसमें उसे अपनी फसल बेचनी होती है. अगर उस समय बाजार में दाम कम मिलते हैं, तो किसान के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचते. या तो वह घाटे में बेचता है या फिर फसल बर्बाद करता है. जालना के किसान ने दूसरा रास्ता चुना, जो उसकी मजबूरी को साफ दिखाता है.
बढ़ती लागत और घटती आमदनी
आज के समय में खेती करना पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है. बीज, खाद, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है. लेकिन इसके मुकाबले किसानों को मिलने वाला दाम स्थिर नहीं रहता. ऐसे में जब बाजार में अचानक गिरावट आती है, तो किसान पूरी तरह से आर्थिक संकट में आ जाता है. यही कारण है कि कई बार किसानों को अपनी फसल तक फेंकनी पड़ती है.
राहत की घोषणा, लेकिन जमीनी असर कम
मिडिल ईस्ट में जारी संकट के चलते निर्यात प्रभावित होने पर केंद्र सरकार ने पहले ही 497 करोड़ रुपये का राहत पैकेज घोषित किया है, ताकि किसानों और व्यापारियों को कुछ मदद मिल सके. लेकिन अक्सर यह मदद समय पर और सही लोगों तक नहीं पहुंच पाती. छोटे और सीमांत किसानों को तुरंत राहत की जरूरत होती है, लेकिन प्रक्रिया लंबी होने के कारण उन्हें इसका पूरा फायदा नहीं मिल पाता.