पराली जलाने की मजबूरी खत्म: आधुनिक मशीनों से बनेगी जैविक खाद, बढ़ेगी पैदावार और घटेगा प्रदूषण

कृषि क्षेत्र में कई ऐसी मशीनें आ चुकी हैं, जो पराली को खत्म करने के बजाय उसे खेत के लिए उपयोगी बना देती हैं. इन मशीनों की मदद से पराली को काटकर, मिलाकर या दबाकर उसे जैविक खाद में बदला जाता है. इससे खेत की मिट्टी मजबूत होती है और अगली फसल की पैदावार भी बेहतर होती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 11 Apr, 2026 | 01:43 PM

Stubble burning solution: भारत में हर साल धान की कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या गंभीर रूप ले लेती है. खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. पराली जलाने से न सिर्फ वातावरण में प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है. हवा में PM2.5 और PM10 जैसे खतरनाक कण बढ़ जाते हैं, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है.

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. नई तकनीक और आधुनिक कृषि मशीनों की मदद से किसान पराली को जलाने की बजाय उसे खेत में ही उपयोग करके जैविक खाद में बदल सकते हैं. यह न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि किसानों की आय और फसल उत्पादन दोनों को बढ़ाने में मदद करता है.

पराली प्रबंधन क्यों बन गया है जरूरी

पराली जलाने से सबसे बड़ा नुकसान मिट्टी को होता है. जब किसान खेत में आग लगाते हैं, तो मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद पोषक तत्व और सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं. इससे जमीन की उर्वरता धीरे-धीरे कम होने लगती है.

इसके अलावा, प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ता है, जिससे शहरों और गांवों दोनों में लोगों को परेशानी होती है. दिल्ली और आसपास के इलाकों में हर साल धुंध की समस्या का एक बड़ा कारण यही पराली जलाना है. ऐसे में अब जरूरी हो गया है कि किसान पराली को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखें.

तकनीक ने दिया नया समाधान

आज कृषि क्षेत्र में कई ऐसी मशीनें आ चुकी हैं, जो पराली को खत्म करने के बजाय उसे खेत के लिए उपयोगी बना देती हैं. इन मशीनों की मदद से पराली को काटकर, मिलाकर या दबाकर उसे जैविक खाद में बदला जाता है. इससे खेत की मिट्टी मजबूत होती है और अगली फसल की पैदावार भी बेहतर होती है.

हैप्पी सीडर: पराली के बीच ही बुवाई

हैप्पी सीडर मशीन पराली प्रबंधन में सबसे ज्यादा कारगर मानी जाती है. यह मशीन पराली को बारीक काटकर मिट्टी में मिला देती है और उसी समय नई फसल की बुवाई भी कर देती है. इससे पराली खेत में मल्च की तरह काम करती है, जो मिट्टी की नमी बनाए रखती है और पौधों की जड़ों को मजबूत बनाती है. समय के साथ यही पराली सड़कर खाद बन जाती है.

मल्चर: मिट्टी को देगा सुरक्षा कवच

मल्चर मशीन पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैला देती है. यह परत मिट्टी को सूरज की तेज किरणों से बचाती है और नमी को बनाए रखती है. यह मशीन उन किसानों के लिए खास फायदेमंद है, जो जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करना चाहते हैं.

रोटावेटर: समय और मेहनत दोनों की बचत

रोटावेटर एक ऐसी मशीन है, जो मिट्टी की गहराई तक जुताई करते हुए पराली को उसमें मिला देती है. इससे खेत जल्दी तैयार हो जाता है और किसान का समय बचता है. यह मशीन खेत की मिट्टी को नरम बनाती है, जिससे बीज अंकुरण बेहतर होता है और फसल की गुणवत्ता बढ़ती है.

मोल्डबोर्ड हल: पारंपरिक लेकिन असरदार तरीका

मोल्डबोर्ड हल पुरानी तकनीक है, लेकिन आज भी काफी प्रभावी है. यह पराली को मिट्टी के अंदर गहराई में दबा देता है, जिससे वह धीरे-धीरे सड़कर खाद में बदल जाती है. इससे मिट्टी की संरचना बेहतर होती है और पौधों की जड़ों को पोषण मिलता है.

सुपर एसएमएस: तुरंत समाधान

सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) को कॉम्बाइन हार्वेस्टर के साथ लगाया जाता है. यह मशीन कटाई के समय ही पराली को बारीक काटकर पूरे खेत में समान रूप से फैला देती है. इससे पराली खेत में बाधा नहीं बनती और अगली फसल की बुवाई आसानी से हो जाती है. साथ ही, यह प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाती है, जिससे समय की बचत होती है.

सरकार की मदद से आसान हुआ काम

सरकार भी पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. इन मशीनों पर 50% तक सब्सिडी दी जा रही है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ कम हो जाता है. इसके अलावा, कस्टम हायरिंग सेंटर के जरिए किसान इन मशीनों को किराए पर भी ले सकते हैं, जिससे छोटे किसान भी इसका फायदा उठा सकें.

कई जगहों पर बायो-CNG प्लांट भी लगाए जा रहे हैं, जहां पराली को खरीदकर ऊर्जा बनाई जाती है. इससे किसानों को अतिरिक्त आय का मौका भी मिलता है.

पराली से बढ़ेगी कमाई और मिट्टी की ताकत

अगर किसान पराली को जलाने के बजाय उसे खाद में बदलते हैं, तो उन्हें दोहरा फायदा मिलता है. एक तरफ खेत की मिट्टी ज्यादा उपजाऊ बनती है, जिससे फसल उत्पादन बढ़ता है. दूसरी तरफ खाद पर खर्च कम हो जाता है. इसके अलावा, पराली को बेचकर भी किसान पैसा कमा सकते हैं, खासकर उन इलाकों में जहां बायो-CNG प्लांट मौजूद हैं.

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