जब एक किसान खेत में बीज बोता है, तो वह सिर्फ फसल नहीं, बल्कि अपने परिवार के सुनहरे सपने और उम्मीदें बोता है. लेकिन कितनी बड़ी त्रासदी है कि उसी अन्नदाता को कभी अपनी जमीन बचाने के लिए, तो कभी अपनी ही मेहनत की फसल बेचने के लिए मौत को गले लगाना पड़ रहा है. उत्तराखंड के सुखवंत सिंह हों, जिन्होंने सिस्टम के अन्याय से हारकर फेसबुक पर अपना दर्द साझा करते हुए दम तोड़ दिया, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के सुमेर सिंह, जिन्हें एक टोकन के लिए जहर पीना पड़ा-ये महज खबरें नहीं, बल्कि हमारे समाज और प्रशासनिक संवेदनहीनता के रिसते हुए जख्म हैं.
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं या सरकारी फाइलें इंसान की जान से कीमती हो जाएं, तब समझ लीजिए कि व्यवस्था आईसीयू में है. ये घटनाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि किसान को सिर्फ वोट बैंक या आंकड़ा न समझा जाए, क्योंकि जब एक किसान टूटता है, तो देश की बुनियाद हिल जाती है.
फेसबुक लाइव, एक सुसाइड नोट और फिर चली गोली
काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह ने हल्द्वानी के एक होटल में जो कदम उठाया, उसने सबको सन्न कर दिया. मरने से पहले उन्होंने फेसबुक पर लाइव आकर अपनी व्यथा सुनाई और करीब 26-27 लोगों को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया. सुखवंत का आरोप था कि जमीन के विवाद और कुछ रसूखदार लोगों के दबाव ने उनका जीना दूभर कर दिया है. वीडियो खत्म होने के कुछ ही देर बाद एक गोली की आवाज आई और एक अन्नदाता की कहानी हमेशा के लिए शांत हो गई. इस घटना के बाद से पूरे इलाके में गुस्सा और गम का माहौल है.
खाकी पर गिरी गाज-पूरी टीम हुई लाइन हाजिर
किसान की मौत के बाद जब सुसाइड नोट में पुलिस और भूमाफिया के गठजोड़ की बात सामने आई, तो एसएसपी ने सख्त कदम उठाया. ड्यूटी में लापरवाही और मामले को गंभीरता से न लेने के आरोप में आईटीआई कोतवाली प्रभारी और दरोगा (SI) को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया. इतना ही नहीं, पैगा चौकी प्रभारी समेत पूरी पुलिस टीम को लाइन हाजिर कर दिया गया है. मृतक के भाई की तहरीर पर 26 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है, लेकिन आरोपी अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. एसआईटी (SIT) की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं, मगर सफलता अब तक हाथ नहीं लगी है.
सीएम धामी का जीरो टॉलरेंस, एक महीने में निपटेंगे विवाद
इस घटना की गूंज देहरादून स्थित सचिवालय तक पहुंची, जिसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा रुख अपनाया है. सीएम ने साफ लहजे में कहा कि अब राज्य में जमीन से जुड़े विवादों को लटकाया नहीं जाएगा. उन्होंने मुख्य सचिव और डीजीपी को निर्देश दिए हैं कि सभी जिलों में एक महीने का विशेष अभियान चलाया जाए. मुख्यमंत्री का लक्ष्य है कि एक महीने के भीतर लंबित जमीन विवादों की संख्या शून्य हो जानी चाहिए. सीएम ने चेतावनी दी है कि इस काम में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और हर हफ्ते इसकी समीक्षा की जाएगी.
प्रशासन की चौकसी- पीड़ित परिवार को मिली सुरक्षा
सुखवंत सिंह की मौत के बाद उनके परिवार में डर का माहौल है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इसे देखते हुए एएसपी स्वप्न किशोर सिंह ने पीड़ित परिवार के घर पर एक कांस्टेबल और एक होमगार्ड की तैनाती कर दी है. इसके अलावा, क्षेत्र में लगातार गश्त करने के निर्देश दिए गए हैं. पुलिस का कहना है कि परिवार को जिस भी तरह की मदद या सुरक्षा की जरूरत होगी, उसे तुरंत उपलब्ध कराया जाएगा. प्रशासन की कोशिश है कि परिवार खुद को अकेला न समझे, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह सुरक्षा अगर सुखवंत के जिंदा रहते मिलती, तो आज तस्वीर कुछ और होती.
किसानों का हुंकार- 21 जनवरी को रुड़की में ट्रैक्टर रैली
इस घटना ने किसानों के गुस्से में घी डालने का काम किया है. भारतीय किसान यूनियन (रोड) के कार्यकर्ताओं ने तहसील पहुंचकर जमकर हंगामा किया और मामले की सीबीआई (CBI) जांच की मांग की. किसानों ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के सामने बैठकर अपना दुखड़ा सुनाया और आरोप लगाया कि भूमाफिया और कुछ भ्रष्ट पुलिसकर्मियों की मिलीभगत से स्थानीय किसानों का शोषण हो रहा है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पदम सिंह रोड ने एलान किया है कि अगर जल्द इंसाफ नहीं मिला, तो 21 जनवरी को रुड़की की सड़कों पर हजारों ट्रैक्टरों के साथ विशाल ट्रैक्टर रैली निकाली जाएगी. सुखवंत सिंह की मौत एक चेतावनी है कि जब जमीन के कागज इंसानी जान से कीमती हो जाते हैं, तो समाज में ऐसी ही त्रासदियां जन्म लेती हैं. अब देखना यह है कि सीएम धामी का यह ‘एक महीने वाला अभियान’ जमीनी हकीकत बदल पाता है या नहीं.
सिस्टम की सुस्ती ने छीनी किसान की मुस्कान
उत्ताराखंड़ के किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या तो वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh News) के कोरबा से एक ऐसी खबर आई है जिसने कलेजा चीर कर रख दिया है. 56 साल के आदिवासी किसान सुमेर सिंह गोड़, जिन्होंने अपनी 3.75 एकड़ जमीन पर खून-पसीना एक करके 68 क्विंटल धान उगाया था, उन्हें अपनी ही फसल बेचने के लिए सिस्टम के आगे घुटने टेकने पड़े. डेढ़ महीने तक पटवारी से लेकर तहसील दफ्तर के चक्कर काटने और मोबाइल न होने के कारण डिजिटल टोकन की उलझन में फंसने के बाद, सुमेर सिंह ने हार मान ली. 12 जनवरी की आधी रात को जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब इस अन्नदाता ने मजबूरी में कीटनाशक पी लिया. पत्नी मुकुंद बाई की चीखों और गिरते गिलास की आवाज ने उनकी जान तो बचा ली, पर व्यवस्था पर गहरे सवाल छोड़ दिए. प्रशासन ने अब पटवारी को सस्पेंड किया है, लेकिन सवाल वही है- एक टोकन की कीमत जान से ज्यादा है?