माखन-मिश्री नहीं, कान्हा को चढ़ता है मिट्टी का पेड़ा! कृष्ण की इस लीला से जुड़ा है रहस्य

मथुरा के ब्रह्मांड घाट में कृष्ण की ऐसी अनोखी लीला से जुड़ी परंपरा आज भी जीवित है, जहां कान्हा को माखन-मिश्री नहीं, मिट्टी के पेड़े का भोग लगाया जाता है. मान्यता है कि यहीं कृष्ण ने बचपन में मिट्टी खाई और यशोदा मैया को पूरे ब्रह्मांड के दर्शन हुए.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 4 Sep, 2026 | 07:17 PM

Krishna Janmashtami 2026: देशभर में आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. मंदिरों में विशेष सजावट, पूजा-अर्चना और भोग की तैयारियां की गई हैं. भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और पूरे ब्रज क्षेत्र में जन्माष्टमी का उत्साह देखते ही बन रहा है. ब्रज में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जो भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े हुए हैं. इन्हीं में मथुरा के महावन स्थित ब्रह्मांड घाट का ब्रह्मांड बिहारी मंदिर भी बेहद खास है. यहां भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री या पेड़े का सामान्य भोग नहीं लगाया जाता, बल्कि मिट्टी से बने पेड़े का भोग लगाने की अनोखी परंपरा है.

कृष्ण की मिट्टी खाने की लीला से जुड़ा है मंदिर

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण  ने बाल अवस्था में इसी स्थान पर गोप-बालकों के साथ खेलते समय मिट्टी खा ली थी. जब बलराम ने इसकी शिकायत माता यशोदा से की तो यशोदा मैया ने कान्हा से मुंह खोलकर दिखाने को कहा. कहा जाता है कि जैसे ही कृष्ण ने अपना मुंह खोला, माता यशोदा आश्चर्यचकित रह गईं. उन्हें बालक कृष्ण के मुंह के भीतर पूरे ब्रह्मांड के दर्शन हुए. मान्यता है कि यशोदा मैया को वहां अनेक लोकों के साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी दर्शन हुए. इस अद्भुत लीला के बाद भी उनके सामने वही नटखट बालक कृष्ण मौजूद थे. भगवान की इसी बाल लीला के कारण इस स्थान को ब्रह्मांड घाट कहा जाता है और यहां विराजमान भगवान को ब्रह्मांड बिहारी के नाम से जाना जाता है.

मिट्टी के पेड़े का लगता है विशेष भोग

ब्रह्मांड बिहारी मंदिर की सबसे खास परंपरा भगवान कृष्ण की इसी बाल लीला से जुड़ी हुई है. यहां कान्हा को मिट्टी से बने पेड़े का भोग लगाया जाता है. यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए बेहद विशेष मानी जाती है, क्योंकि इसका सीधा संबंध कृष्ण के मिट्टी खाने की लीला से बताया जाता है. मंदिर में आने वाले भक्त भगवान के दर्शन करने के साथ इस अनोखे प्रसाद को श्रद्धा से ग्रहण करते हैं. कई श्रद्धालु मिट्टी के पेड़े को प्रसाद  के रूप में अपने घर ले जाते हैं और परिवार, रिश्तेदारों तथा परिचितों में बांटते हैं. भक्तों के लिए यह प्रसाद केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीलाओं और ब्रज की धार्मिक परंपराओं से जुड़ी आस्था का प्रतीक है.

जन्माष्टमी पर उमड़ते हैं श्रद्धालु

जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा और ब्रज  क्षेत्र के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है. ब्रह्मांड बिहारी मंदिर में भी श्रद्धालु कान्हा के दर्शन करने और कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े इस पवित्र स्थल को देखने पहुंचते हैं. मंदिर में जन्माष्टमी के दौरान धार्मिक आयोजन और विशेष पूजा-अर्चना का माहौल रहता है. दूर-दूर से आने वाले भक्त यहां भगवान कृष्ण की बाल स्वरूप में पूजा करते हैं और मिट्टी के पेड़े का प्रसाद ग्रहण करते हैं.

ब्रह्मांड घाट की क्या है खासियत?

ब्रह्मांड घाट को भगवान कृष्ण की उस लीला से जोड़कर देखा जाता है, जिसमें उन्होंने मिट्टी खाई और माता यशोदा को अपने मुंह में पूरे ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे. इसी वजह से यह स्थान ब्रज की प्रमुख कृष्ण लीला स्थली में गिना जाता है. ब्रह्मांड बिहारी मंदिर की मिट्टी के पेड़े की परंपरा इस स्थान को अन्य कृष्ण मंदिरों से अलग पहचान देती है. जन्माष्टमी के मौके पर यहां आने वाले भक्त भगवान के दर्शन के साथ इस सदियों पुरानी धार्मिक मान्यता और अनोखी परंपरा से भी जुड़ते हैं. यही वजह है कि ब्रह्मांड घाट आज भी कृष्ण भक्तों के लिए विशेष आस्था और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

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