Fig Farming: जब भी अंजीर की बात होती है, तो लोगों के जेहन में सबसे तुर्की, मिस्र, अल्जीरिया, मोरक्को, ईरान, स्पेन का नाम उभरकर सामने आता है. लोगों को लगता है कि अंजीर की खेती केवल इन देशों में होती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. महाराष्ट्र के पुणे जिला स्थित पुरंदर में भी अंजीर की खेती बड़े स्तर होती है. इस अंजीर को पूरी दुनिया में पुरंदर अंजर के नाम से जाना जाता है. इसकी सप्लाई विदेशों में भी होती है. खास बात यह है कि माहाराष्ट्र में उगाए जाने वाले अंजीर को पुरंदर अंजीर के नाम से जीआई टैग मिला हुआ है. इससे इसकी मांग पूरी दुनिया में बढ़ गई है. ऐसे में यहां के अंजीर किसानों की कमाई बढ़ गई है. तो आइए आज जानते हैं पुरंदर अंजीर की खासियत के बारे में.
पुरंदर अंजीर भारत के सबसे बेहतरीन अंजीरों में से एक माना जाता है और इसे GI टैग भी मिला हुआ है. यह अपने मीठे स्वाद, बड़े आकार और पौष्टिक गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं. इसकी खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र के पुणे जिले के पुरंदर तालुका के कई गांवों में होती है. यहां की सूखी जलवायु, पहाड़ी ढलान और अच्छी जल निकासी वाली जमीन अंजीर की खेती के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है. पुरंदर क्षेत्र की लाल और काली मिट्टी, जिसमें कैल्शियम और पोटैशियम की मात्रा अधिक होती है, अंजीर को उसका खास बैंगनी रंग और बड़ा आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
बैंगनी रंग अन्य अंजीर किस्मों से अलग पहचान देती है
पुरंदर अंजीर आकार में घंटी जैसा होता है और दूसरी किस्मों की तुलना में ज्यादा बड़ा होता है. इसकी बैंगनी रंग की त्वचा इसे अन्य अंजीर किस्मों से अलग पहचान देती है. इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा गूदे (खाने योग्य भाग) का होता है. इसका गूदा गुलाबी-लाल रंग का होता है और यह काफी पौष्टिक माना जाता है. इसके अलावा यह विटामिन और खनिजों का अच्छा स्रोत भी है, जो सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं.
इनते मीटर की दूरी पर करें पौधों की रोपाई
GI टैग प्राप्त पुरंदर अंजीर की खेती महाराष्ट्र में मुख्य रूप से पुणे के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है. इसकी खेती के लिए लाल-काली मिट्टी, शुष्क जलवायु और अच्छी जल निकासी वाली भूमि उपयुक्त मानी जाती है. पौधों को आमतौर पर 3×3 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. रोपाई के लगभग 1- 2 साल बाद पौधों में फल आने लगते हैं, जबकि 3 साल बाद इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाता है.
7- 8 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त होती है
ऐसे अंजीर की खेती में बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. गर्मियों में 7- 8 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त होती है, जबकि मॉनसून में कम पानी देना पड़ता है. इसके लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली सबसे बेहतर मानी जाती है. अच्छी पैदावार के लिए गोबर की खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करना चाहिए, जिसे आमतौर पर मार्च, जुलाई और अक्टूबर में दिया जाता है. पौधे लगाने के 1- 2 साल बाद फल आना शुरू हो जाते हैं और ये पेड़ 30- 40 साल तक उत्पादन दे सकते हैं. फल आने के बाद पुरानी शाखाओं की छंटाई करना जरूरी होता है. अंजीर के फल आमतौर पर मई से अगस्त के बीच पकते हैं और इन्हें हाथ से तोड़ा जाता है. भारत में इसकी कीमत लगभग 800 से 1200 रुपये प्रति किलो तक मिल सकती है.
इन राज्यों में होती है अंजीर की खेती
भारत में अंजीर की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में की जाती है. देश में अंजीर की खेती का कुल क्षेत्रफल लगभग 5,600 हेक्टेयर है और करीब 13,802 टन उत्पादन होता है. महाराष्ट्र में लगभग 400 हेक्टेयर भूमि पर अंजीर की खेती होती है, जहां से करीब 4,300 टन ताजे अंजीर पैदा होते हैं. इनमें से लगभग 90- 92 फीसदी उत्पादन पुणे जिले में होता है और पुरंदर क्षेत्र इसके लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है. अंजीर का मौसम साल में दो बार मई से जून और दिसंबर से जनवरी के बीच आता है. पुणे के मशहूर पुरंदर अंजीर को 2016 में GI टैग (भौगोलिक संकेत) मिला.
भारत का पहला रेडी-टू-ड्रिंक अंजीर जूस पोलैंड को निर्यात
भारत के GI टैग वाले पुरंदर अंजीर अब यूरोप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं. 2024 में मोदी सरकार ने भारत का पहला रेडी-टू-ड्रिंक अंजीर जूस पोलैंड को निर्यात करना शुरू किया था. इससे पहले 2022 में यह जर्मनी भेजा जा चुका था. अपने खास स्वाद और बनावट के कारण पुरंदर अंजीर वैश्विक स्तर पर भारत के कृषि उत्पादों को बढ़ावा दे रहे हैं.
खबर से जुड़े रोचक आंकड़े
- पुरंदर अंजीर को साल 2016 में मिला जीआई टैग.
- 2024 में भारत का पहला रेडी-टू-ड्रिंक अंजीर जूस पोलैंड को निर्यात किया गया.
- महाराष्ट्र में लगभग 400 हेक्टेयर भूमि पर होती है खेती.
- साल में 4,300 टन अंजीर का होता है उत्पादन.
- बुवाई के 2 साल बाद उत्पादन शुरू.
- गर्मियों में 7- 8 दिन के अंतराल पर सिंचाई होती है.