भारत-यूरोप ट्रेड डील में वन आधारित उत्पादों की एंट्री की तैयारी, लाखों आदिवासियों को मिल सकती है नई पहचान

SEA के अनुसार वन-आधारित उत्पादों को कृषि उत्पादों के साथ जोड़ना सही नहीं है. ये वे उत्पाद हैं, जो खेती से नहीं बल्कि जंगलों से एकत्र किए जाते हैं और जिनका सीधा संबंध आदिवासी आजीविका से है. साल बीज, आम की गुठली, कोकम बीज, महुआ और अन्य पेड़-आधारित तिलहन ऐसे ही उत्पाद हैं, जिन पर लाखों आदिवासी परिवार निर्भर हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 20 Jan, 2026 | 02:50 PM

India EU trade pact: भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर उद्योग जगत में हलचल तेज है. इसी कड़ी में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने केंद्र सरकार से एक अहम मांग रखी है. एसोसिएशन का कहना है कि इस व्यापार समझौते में वन-आधारित उत्पादों को अलग श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि इनका लाभ सीधे आदिवासी समुदायों और भारतीय उद्योग तक पहुंच सके. यह मांग ऐसे समय आई है, जब भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की तैयारी चल रही है.

कृषि नहीं, जंगल से जुड़े हैं ये उत्पाद

SEA के अनुसार वन-आधारित उत्पादों को कृषि उत्पादों के साथ जोड़ना सही नहीं है. ये वे उत्पाद हैं, जो खेती से नहीं बल्कि जंगलों से एकत्र किए जाते हैं और जिनका सीधा संबंध आदिवासी आजीविका से है. साल बीज, आम की गुठली, कोकम बीज, महुआ और अन्य पेड़-आधारित तिलहन ऐसे ही उत्पाद हैं, जिन पर लाखों आदिवासी परिवार निर्भर हैं. इनसे न केवल रोजगार मिलता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन कर इन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जाता है.

आदिवासियों की आजीविका का सवाल

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, भारत के कई वन क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय सदियों से जंगलों से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर रहे हैं. इन उत्पादों की खरीद, प्रसंस्करण और निर्यात से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है. SEA का मानना है कि अगर भारत-EU व्यापार समझौते में इन उत्पादों को शामिल नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर आदिवासी आय पर पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय खरीदार शुल्क और नियमों का फायदा उठाकर भारतीय उत्पादों की जगह दूसरे देशों से सस्ता माल खरीद सकते हैं, जिससे भारत की हिस्सेदारी घट सकती है.

वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की पहचान

भारतीय कंपनियां आज दुनिया की बड़ी चॉकलेट और कॉस्मेटिक कंपनियों को साल-आधारित बटर, मैंगो बटर और कोकम बटर जैसे उत्पाद सप्लाई कर रही हैं. ये उत्पाद गुणवत्ता में किसी भी यूरोपीय बहुराष्ट्रीय कंपनी से कम नहीं हैं. लेकिन यदि व्यापार समझौते में टैरिफ राहत नहीं मिली, तो भारतीय उद्योग को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा. इससे न केवल निर्यात प्रभावित होगा, बल्कि घरेलू उद्योग की मजबूती भी कमजोर पड़ सकती है.

व्यापार और तकनीक दोनों को मिलेगा बढ़ावा

SEA का कहना है कि अगर वन-आधारित उत्पादों पर शुल्क कम किया जाता है या खत्म किया जाता है, तो भारत और यूरोपीय संघ दोनों को फायदा होगा. इससे व्यापार आसान होगा, लागत घटेगी और नए बाजार खुलेंगे. साथ ही, इन उत्पादों का उपयोग खास खाद्य पदार्थों, सौंदर्य प्रसाधनों और औद्योगिक सामग्रियों में होता है, जिससे नवाचार और तकनीकी विकास को भी गति मिलेगी. इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और दोनों क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी.

सप्लाई चेन को मिलेगी स्थिरता

आज वैश्विक व्यापार में सबसे बड़ी चुनौती सप्लाई चेन की स्थिरता है. वन-आधारित उत्पाद भारत और यूरोप दोनों की आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं. टैरिफ में राहत मिलने से कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और उद्योगों को अनिश्चित लागत से बचाया जा सकेगा. इससे लंबे समय तक भरोसेमंद व्यापार संबंध बन पाएंगे.

भारत-EU संबंधों को मिलेगी नई दिशा

SEA का मानना है कि इस कदम से भारत और यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे. वन-आधारित उद्योग को संरक्षण मिलने से न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की नई संभावनाएं भी खुलेंगी. यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समावेशन का माध्यम भी बनेगा.

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