यूरिया डालने में जल्दबाजी बनी किसानों की सबसे बड़ी भूल! विशेषज्ञ ने बताया सही तरीका

धान की रोपाई के बाद यूरिया का गलत इस्तेमाल किसानों की मेहनत और पैसा दोनों बर्बाद कर सकता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से यूरिया देने पर ही फसल मजबूत बनती है, खाद की बचत होती है और धान की पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी मिलती है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 25 Jul, 2026 | 04:45 PM

Paddy Farming: धान की रोपाई पूरी होने के बाद फसल की अच्छी बढ़वार और अधिक उत्पादन के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन बेहद जरूरी हो जाता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय यूरिया का सही मात्रा, सही समय और सही तरीके से उपयोग करना सबसे महत्वपूर्ण है. कई किसान अधिक उपज की उम्मीद में जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से यूरिया का प्रयोग कर देते हैं, जिससे फसल को लाभ मिलने के बजाय नुकसान हो सकता है. यदि पानी से भरे खेत में यूरिया डाल दिया जाए तो नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा पानी के साथ बह जाता है या मिट्टी की गहराई में पहुंच जाता है. ऐसे में पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और उर्वरक पर किया गया खर्च भी बेकार हो जाता है.

यूरिया कभी एक साथ न डालें, तीन चरणों में करें प्रयोग

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार धान की फसल में यूरिया  का प्रयोग एक बार में करने के बजाय तीन चरणों में करना चाहिए. पहली खुराक रोपाई के समय या रोपाई के 7 से 10 दिनों के भीतर दें. इस दौरान कुल नाइट्रोजन की केवल 25 से 30 प्रतिशत मात्रा ही पर्याप्त मानी जाती है. इसके साथ फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा देने से जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधे मजबूत बनते हैं. दूसरी खुराक रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद, जब फसल में कल्ले निकलने लगें, तब देनी चाहिए. तीसरी और अंतिम खुराक 40 से 45 दिन बाद, जब तने के भीतर बालियां बनने की शुरुआत हो, उस समय देना सबसे अधिक लाभकारी माना जाता है. इससे कल्लों की संख्या बढ़ती है, बालियां लंबी बनती हैं और दानों का भराव भी बेहतर होता है.

खाद डालने से पहले खेत का पानी निकालना जरूरी

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार यूरिया डालने से पहले खेत में जमा अतिरिक्त पानी निकाल देना चाहिए. खेत में केवल पर्याप्त नमी होनी चाहिए ताकि उर्वरक सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंच सके. यदि पानी भरे खेत में यूरिया का छिड़काव किया जाता है तो नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है. इससे फसल को अपेक्षित पोषण नहीं मिल पाता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि खेत की स्थिति देखकर ही उर्वरकों का प्रयोग करना  चाहिए. मिट्टी की जरूरत और फसल की अवस्था के अनुसार पोषण देने से पौधों की बढ़वार बेहतर होती है और रोगों का खतरा भी कम रहता है.

नीम लेपित यूरिया और एलसीसी तकनीक से मिलेगा अधिक लाभ

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार यूरिया का छिड़काव हमेशा शाम के समय करना अधिक उपयुक्त रहता है. तेज धूप में नाइट्रोजन अमोनिया गैस के रूप में उड़ सकती है, जिससे उर्वरक की प्रभावशीलता कम हो जाती है. किसानों को सामान्य यूरिया की बजाय नीम लेपित यूरिया का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि यह धीरे-धीरे घुलता है और लंबे समय तक पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है. इसके अलावा, लीफ कलर चार्ट (एलसीसी) की मदद से पत्तियों के रंग के आधार पर नाइट्रोजन की आवश्यकता  का आकलन किया जा सकता है. इससे केवल जरूरत के अनुसार यूरिया का उपयोग होता है, उर्वरक की बचत होती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से उर्वरक प्रबंधन अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं.

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