धान की रोपाई के बाद किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने की जरूरत है, क्योंकि इस समय कई रोगों का प्रकोप फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. इनमें खैरा रोग धान की प्रमुख समस्याओं में से एक है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार यह रोग मुख्य रूप से मिट्टी में जिंक की कमी के कारण होता है. इसकी शुरुआत पत्तियों के पीले पड़ने से होती है और समय पर उपचार नहीं करने पर पत्तियां कत्थई होकर सूखने लगती हैं. इससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है.
जिंक की कमी से होता है खैरा रोग, ऐसे करें पहचान
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार धान में खैरा रोग का मुख्य कारण मिट्टी में जिंक तत्व की कमी होती है. जिन खेतों में मिट्टी की क्षारीयता अधिक होती है या कैल्शियम की मात्रा ज्यादा पाई जाती है, वहां इस रोग का खतरा बढ़ जाता है. आमतौर पर रोपाई के 20 से 25 दिनों बाद इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं. इस रोग की शुरुआत धान की पत्तियों पर हल्के पीले धब्बों के रूप में होती है. धीरे-धीरे ये धब्बे कत्थई या भूरे रंग के हो जाते हैं. रोग बढ़ने पर पौधे कमजोर और छोटे रह जाते हैं. प्रभावित पौधों की जड़ों का रंग भी कत्थई दिखाई देने लगता है. ऐसे लक्षण दिखाई देते ही किसानों को तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए.
पत्तियां पीली दिखें तो तुरंत करें ये उपाय
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार बताते हैं कि खैरा रोग को नियंत्रित करने के लिए जिंक सल्फेट का प्रयोग सबसे प्रभावी उपायों में से एक है. इसके लिए किसान 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 20 किलोग्राम यूरिया को मिलाकर 1000 लीटर पानी में घोल तैयार करें. इस घोल का प्रति हेक्टेयर खेत में छिड़काव करें. इस उपाय से पौधों को आवश्यक जिंक तत्व मिलता है और रोग का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है. साथ ही पौधों का विकास बेहतर होता है और फसल की बढ़वार में रुकावट नहीं आती. किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि छिड़काव सही मात्रा और उचित समय पर ही करें.
फसल की नियमित निगरानी से समय पर होगा बचाव
धान की फसल में रोगों से बचाव के लिए किसानों को शुरुआत से ही खेतों की निगरानी करनी चाहिए. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रोपाई के बाद पौधों की स्थिति, पत्तियों के रंग और विकास पर लगातार नजर रखें. अगर पत्तियों में बदलाव दिखाई दे तो तुरंत कारण की पहचान कर उपचार करें. खेत में संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग भी बेहद जरूरी है. केवल नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करने से पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे रोगों का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.
समय पर उपचार से बढ़ेगी पैदावार, सुरक्षित रहेगी फसल
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार खैरा रोग को शुरुआती अवस्था में आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. यदि किसान समय रहते रोग की पहचान कर जिंक सल्फेट का प्रयोग करते हैं, तो पौधों की वृद्धि सामान्य बनी रहती है और उत्पादन में कमी नहीं आती. धान किसानों के लिए जरूरी है कि वे रोपाई के बाद खेतों की नियमित जांच करें और पत्तियों में पीलेपन या भूरे धब्बों जैसे संकेतों को नजरअंदाज न करें. सही पोषण प्रबंधन, समय पर उपचार और वैज्ञानिक सलाह अपनाकर किसान खैरा रोग से अपनी फसल को बचा सकते हैं और बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.