Mango farming tips India: भारत में आम को फलों का राजा कहा जाता है और इसकी खेती किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया है. जैसे ही गर्मी का मौसम शुरू होता है, आम के पेड़ों पर बौर आने लगते हैं और यही बौर आगे चलकर छोटे-छोटे फलों यानी टिकोले में बदल जाते हैं. यह समय किसानों के लिए सबसे अहम होता है, क्योंकि इसी दौरान फसल का भविष्य तय होता है. अगर इस समय थोड़ी भी लापरवाही हो जाए, तो टिकोले झड़ने लगते हैं और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है.
मार्च-अप्रैल का समय क्यों है सबसे जरूरी
बरेली जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक किसान इंडिया को बताया कि मार्च से अप्रैल का समय आम की बागवानी के लिए बहुत संवेदनशील होता है. इसी दौरान बौर फल में बदलते हैं और पेड़ों को खास देखभाल की जरूरत होती है. अगर किसान इस समय पौधों पर ध्यान नहीं देते, तो छोटे फल गिरने लगते हैं और पूरी मेहनत बेकार हो सकती है.
टिकोले झड़ने के पीछे क्या हैं कारण
आम के पेड़ों से टिकोले (छोटे फल) झड़ने की समस्या कई वजहों से होती है. मौसम का अचानक बदलना, तेज गर्मी, नमी की कमी और तेज हवाएं इसका बड़ा कारण बनती हैं. इसके अलावा पौधों को सही पोषण न मिलना और कीटों का हमला भी इस समस्या को बढ़ा देता है. कई बार सिंचाई और खाद का सही संतुलन न होने से भी पेड़ कमजोर हो जाते हैं और फल टिक नहीं पाते.
समय पर दवा का छिड़काव है जरूरी
जैसे ही पेड़ों पर टिकोले दिखने लगें, उसी समय सही दवा का छिड़काव करना बहुत जरूरी होता है. डॉ. पुनीत कुमार पाठक बताते हैं कि इमिडाक्लोप्रिड और प्लानोफिक्स का सही मात्रा में उपयोग करने से टिकोले झड़ने की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है. इमिडाक्लोप्रिड को लगभग 6 मिली दवा 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए, जबकि प्लानोफिक्स को 1 मिली दवा 4 से 5 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना फायदेमंद रहता है. इससे कीटों से बचाव होता है और फलों की ग्रोथ भी बेहतर होती है.
रोग और कीट भी बढ़ाते हैं समस्या
इस समय आम के पेड़ों पर कई तरह के रोग और कीट हमला कर सकते हैं. चूर्णी रोग यानी पाउडरी मिल्ड्यू एक आम बीमारी है, जिसमें पत्तियों और फूलों पर सफेद परत दिखाई देती है. इससे बौर सूख जाती है और फल बनने से पहले ही गिर जाती है. इसके अलावा थ्रिप्स, माइट्स और हॉपर जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए इनसे बचाव के लिए समय पर दवा का छिड़काव करना जरूरी होता है.
सिंचाई और खाद में संतुलन जरूरी
कई बार किसान ज्यादा पानी या ज्यादा खाद देने की गलती कर बैठते हैं, जिससे नुकसान हो सकता है. इस समय जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई करनी चाहिए और अधिक उर्वरक देने से बचना चाहिए. संतुलन बनाए रखने से पेड़ स्वस्थ रहते हैं और फल गिरने की समस्या कम होती है.
धुएं का असर भी बन रहा खतरा
कुछ इलाकों में ईंट भट्टों या फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं भी आम के पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है. इससे फूल काले पड़ जाते हैं और धीरे-धीरे झड़ने लगते हैं. ऐसे में कार्बेंडाजिम और मैनकोजेब का छिड़काव करने से पेड़ों को बचाया जा सकता है.
जैविक उपाय भी हैं असरदार
जो किसान रासायनिक दवाओं से बचना चाहते हैं, वे जैविक उपाय भी अपना सकते हैं. नीम का अर्क, जीवामृत, गोमूत्र या छाछ का घोल बनाकर छिड़काव करने से कीटों पर नियंत्रण पाया जा सकता है और पौधे स्वस्थ रहते हैं. यह तरीका सुरक्षित और पर्यावरण के लिए भी बेहतर होता है.
सही देखभाल ही है सफलता की कुंजी
आम की खेती में सबसे जरूरी है सही समय पर सही देखभाल. यही वह समय होता है जब किसान की पूरी मेहनत दांव पर होती है. अगर इस समय ध्यान दिया जाए, तो टिकोले झड़ने की समस्या को रोका जा सकता है और पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है.
डॉ. पुनीत कुमार पाठक के अनुसार, अगर किसान समय पर दवा का छिड़काव करें, सिंचाई संतुलित रखें और पौधों की नियमित निगरानी करें, तो आम की फसल बेहतर होगी और किसानों को अच्छा मुनाफा मिलेगा.