रासायनिक खेती को कहा अलविदा, राजस्थान में पहली बार पूरी तरह ऑर्गेनिक बनी ग्राम पंचायत

गांव ने यह फैसला किया कि खेतों में न तो रासायनिक कीटनाशक डाले जाएंगे और न ही सिंथेटिक उर्वरकों का इस्तेमाल होगा. पशुपालन में भी प्राकृतिक और स्वास्थ्य के अनुकूल तरीकों को अपनाया गया. आज यह पंचायत राजस्थान की पहली ऐसी ग्राम पंचायत बन गई है, जिसे पूरी तरह ऑर्गेनिक होने का आधिकारिक प्रमाणन मिला है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 13 Jan, 2026 | 12:13 PM

Organic certification village: राजस्थान के कोटपूतली–बहरोड़ जिले की बामनवास कंकर ग्राम पंचायत ने खेती के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मिसाल पेश की है. यह पंचायत अब राजस्थान की पहली ऐसी ग्राम पंचायत बन गई है, जिसे पूरी तरह जैविक (ऑर्गेनिक) होने का आधिकारिक प्रमाणन मिला है. इस फैसले के साथ बामनवास कंकर ने यह दिखा दिया है कि अगर गांव मिलकर ठान लें, तो खेती को न सिर्फ सुरक्षित बनाया जा सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी टिकाऊ रास्ता चुना जा सकता है.

मिट्टी, पानी और सेहत की चिंता से शुरू हुआ बदलाव

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, बामनवास कंकर पंचायत, जिसमें बामनवास, नांगलहेड़ी, राह का माला, भडाना की भाल, तोलावास, खरिया की ढाणी और बैरावास जैसे सात गांव शामिल हैं, वहां बीते कुछ वर्षों से खेती को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं. खेतों की मिट्टी कमजोर होती जा रही थी, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा था और फसलों में पहले जैसी गुणवत्ता नहीं रह गई थी. रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता से खेती की लागत बढ़ रही थी और लोगों की सेहत पर भी असर दिखने लगा था.

सामूहिक सोच से बदला खेती का रास्ता

इन समस्याओं पर गांव में लगातार चर्चा होती रही. पंचायत स्तर पर बैठकों का दौर चला और धीरे-धीरे यह समझ बनी कि अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक समाधान की जरूरत है. पंचायत के सरपंच गणेश जाट के नेतृत्व में गांव ने यह बड़ा फैसला लिया कि अब खेती और पशुपालन दोनों को पूरी तरह रसायन-मुक्त बनाया जाएगा. यह फैसला किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक सहमति से लिया गया.

जैविक खेती को मिला तकनीकी सहारा

इस बदलाव में कोफार्मिन फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक सोसाइटीज एंड प्रोड्यूसर कंपनियां (COFED) ने अहम भूमिका निभाई. COFED ने गांव के किसानों को जैविक खेती के तरीकों, प्रमाणन प्रक्रिया और बाजार से जुड़ने की जानकारी दी. खेतों में अब फसल चक्र, मल्चिंग और प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल होने लगा. वर्मी कम्पोस्ट, जैविक मिट्टी सुधारक और प्राकृतिक कीट नियंत्रण उपायों ने रासायनिक दवाओं की जगह ले ली.

दिखने लगे बदलाव के नतीजे

कुछ ही समय में इसके सकारात्मक असर दिखने लगे. खेतों में केंचुए और लाभकारी सूक्ष्मजीव लौटने लगे, जिससे मिट्टी की सेहत सुधरी. पानी की पकड़ बेहतर हुई और फसलों की गुणवत्ता में सुधार आया. पशुपालन में भी बदलाव नजर आया. रसायन-मुक्त चारा और प्राकृतिक तरीकों से पशुओं की सेहत बेहतर हुई और दूध की गुणवत्ता बढ़ी, जिससे बाजार में उसका मूल्य भी अच्छा मिलने लगा.

प्रमाणन और संकल्प का ऐतिहासिक दिन

इस उपलब्धि को औपचारिक रूप से दर्ज करने के लिए 2 जनवरी को पंचायत में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस मौके पर गांव के किसान, पशुपालक, पंचायत प्रतिनिधि और COFED के सदस्य एकत्र हुए. सभी ने रासायनिक खेती और पशुपालन से दूरी बनाए रखने की सार्वजनिक शपथ ली. COFED के संस्थापक जितेंद्र सेवावत ने इस मौके पर कहा कि बामनवास कंकर की यह उपलब्धि किसी कागजी योजना का नतीजा नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन है.

दूसरे गांवों के लिए बना मॉडल

COFED ने बताया कि बामनवास कंकर के अनुभव से प्रेरणा लेते हुए इस साल के अंत तक बीकानेर, अलवर, कोटपूतली–बहरोड़ और भीलवाड़ा जिलों की करीब 300 पंचायतों को पूरी तरह जैविक बनाने का लक्ष्य रखा गया है. बामनवास कंकर की सफलता यह दिखाती है कि जब गांव खुद बदलाव की जिम्मेदारी लेते हैं, तो टिकाऊ खेती सिर्फ सपना नहीं रहती, बल्कि हकीकत बन जाती है.

यह पंचायत आज न सिर्फ राजस्थान, बल्कि पूरे देश के लिए यह संदेश दे रही है कि असली बदलाव खेतों से शुरू होता है और जब गांव एकजुट हो जाएं, तो खेती प्रकृति के साथ फिर से तालमेल बिठा सकती है.

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