टमाटर आज किसानों के लिए सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि आमदनी का मजबूत सहारा बन चुका है. रसोई से लेकर होटल और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री तक इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है. यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान टमाटर की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल सही प्रबंधन के साथ अच्छा मुनाफा दे सकती है.
लेकिन फरवरी के बदलते मौसम ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. दिन में हल्की गर्मी और रात में ठंड, साथ ही सुबह की नमी और कोहरा ये सब मिलकर टमाटर की फसल में बीमारियों को तेजी से फैलने का मौका दे रहे हैं. खासकर झुलसा रोग इस समय सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. अगर समय रहते इसका नियंत्रण न किया जाए, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है.
बदलते मौसम का असर
फरवरी का महीना मौसम के लिहाज से संक्रमण काल माना जाता है. इस समय तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव होता है. सुबह खेतों में ओस और नमी रहती है, जबकि दोपहर में धूप तेज हो जाती है. यही वातावरण फफूंद जनित रोगों के लिए अनुकूल होता है.
टमाटर के पौधे को संतुलित तापमान और नियंत्रित नमी की जरूरत होती है. जब खेत में पानी ज्यादा ठहर जाता है या हवा का संचार ठीक से नहीं होता, तब रोग तेजी से फैलते हैं. कई किसानों के खेतों में यही स्थिति देखने को मिल रही है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है.
झुलसा रोग क्या है और कैसे पहचानें
झुलसा रोग मुख्य रूप से फफूंद के कारण होता है. इसे दो प्रकारों में बांटा जाता है अर्ली ब्लाइट और लेट ब्लाइट. फरवरी में दोनों का खतरा बना रहता है. इस रोग की शुरुआत पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे या काले धब्बों से होती है. धीरे-धीरे ये धब्बे गोल आकार लेकर फैलने लगते हैं. पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और अंत में सूखकर गिर जाती हैं. यदि रोग बढ़ जाए तो यह तनों और फलों तक पहुंच जाता है.
फल पर धब्बे पड़ने से उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है. बाजार में ऐसे टमाटर को कम दाम मिलते हैं या कई बार व्यापारी लेने से भी मना कर देते हैं. यही कारण है कि यह रोग किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का बड़ा कारण बन जाता है.
समय पर दवा का छिड़काव क्यों जरूरी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि खेत में लगभग 8 से 10 प्रतिशत पौधों पर झुलसा के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत नियंत्रण के उपाय शुरू कर देने चाहिए. विशेषज्ञों की सलाह है कि मेटालैक्सिल और मैंकोजेब के मिश्रण का घोल बनाकर 10 से 12 दिन के अंतराल पर छिड़काव किया जाए.
छिड़काव करते समय यह ध्यान रखें कि दवा पत्तियों के ऊपरी और निचले दोनों हिस्सों तक पहुंचे. सुबह या शाम के समय छिड़काव करना बेहतर रहता है, ताकि धूप के कारण दवा का असर कम न हो.
रासायनिक दवा के साथ-साथ नीम तेल का प्रयोग भी फायदेमंद होता है. नीम आधारित जैविक घोल रोग की तीव्रता कम करने में मदद करता है और पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है.
खेत प्रबंधन से भी मिलेगी राहत
केवल दवा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. खेत की साफ-सफाई और जल निकासी की व्यवस्था भी बेहद जरूरी है. संक्रमित पत्तियों और पौधों को तुरंत खेत से हटाकर नष्ट कर देना चाहिए. खेत में पानी का ठहराव न होने दें. ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाने से पत्तियों पर अनावश्यक नमी कम रहती है, जिससे रोग का खतरा घटता है. पौधों के बीच उचित दूरी रखने से हवा का संचार बेहतर होता है और संक्रमण कम फैलता है.
फसल चक्र अपनाना भी महत्वपूर्ण है. लगातार एक ही खेत में टमाटर उगाने से रोगों का दबाव बढ़ जाता है. इसलिए अगली फसल में दूसरी सब्जी लगाने से मिट्टी में रोगजनक तत्वों की संख्या कम होती है.
बैक्टेरियल स्पॉट भी बना चुनौती
झुलसा रोग के अलावा फरवरी में बैक्टेरियल स्पॉट रोग भी देखने को मिल रहा है. इस रोग में पत्तियों और फलों पर छोटे काले धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में गहरे होकर फलों को खराब कर देते हैं. इससे बचाव के लिए भी संतुलित सिंचाई और खेत की स्वच्छता जरूरी है. जरूरत पड़ने पर कॉपर आधारित दवाओं का सीमित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है. हालांकि दवा का प्रयोग हमेशा कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए.
सही जानकारी ही असली बचाव
टमाटर की खेती में लाभ तभी संभव है जब किसान समय-समय पर फसल की निगरानी करें. पौधों में हल्का सा भी बदलाव दिखे तो तुरंत जांच करें. उद्यान विभाग और कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क बनाए रखें. आज कई जिलों में कृषि विभाग किसानों को प्रशिक्षण और बीज सहायता दे रहा है. इन सुविधाओं का लाभ उठाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं.
बदलते मौसम में सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है. यदि किसान समय पर झुलसा रोग की पहचान कर लें और उचित घोल का छिड़काव कर दें, तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है. सही देखभाल और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर टमाटर की खेती आज भी किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है.