कोरोना के बाद पशुपालन बना युवाओं का सहारा, बकरी और मुर्गी फार्म से लाखों परिवार हुए आत्मनिर्भर

बिहार के गांवों में अब लोग बकरी, मुर्गी, गाय और मछली पालन से अच्छी कमाई कर रहे हैं. कोरोना के बाद पशुपालन ने रोजगार और आमदनी का नया रास्ता दिखाया. महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लोन आसान हुआ है. अब गांव सिर्फ खेती तक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहे हैं.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 6 Jan, 2026 | 08:28 PM

Bihar News : कभी रोजी-रोटी की तलाश में गांव के लोग शहरों की भीड़ में गुम हो जाया करते थे. खेत सूने रह जाते थे और घरों में आमदनी का कोई ठोस सहारा नहीं होता था. लेकिन अब तस्वीर बहुत तेजी से बदल रही है. बिहार के गांवों में आज लोग अपने ही घर के पास बकरी, मुर्गी, गाय और मछली पालकर अच्छी कमाई कर रहे हैं. पशुपालन ने न सिर्फ पलायन रोका है, बल्कि हजारों परिवारों को लखपति बनने की राह भी दिखाई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों और सतत जीविकोपार्जन योजना के चलते पशुपालन अब सिर्फ सहायक काम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है. गांवों में मेहनत का सही दाम मिलने लगा है और लोग आत्मनिर्भर बन रहे हैं.

पशुपालन बना गांवों की कमाई का नया रास्ता

ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बीते 20 वर्षों में इस योजना से जुड़े गरीब परिवारों  की आमदनी लगभग दोगुनी हो चुकी है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पहले जो लोग सिर्फ खेती या मजदूरी पर निर्भर थे, वे अब पशुपालन को जोड़कर सालाना एक से डेढ़ लाख रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं. बकरी पालन , पोल्ट्री फार्म, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे कामों में ज्यादा जमीन या भारी निवेश की जरूरत नहीं होती. यही वजह है कि छोटे किसान और भूमिहीन परिवार भी इससे जुड़ पा रहे हैं. गांवों में अब यह आम बात हो गई है कि कोई बकरी पालन से बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकाल रहा है, तो कोई मुर्गी पालन से घर बना रहा है.

कोरोना के बाद बढ़ा पशुपालन का भरोसा

कोरोना काल ने शहरों की अस्थिरता सबको दिखा दी. नौकरी गई तो लोग वापस गांव लौटे और यहीं कुछ नया करने का सोचने लगे. इसी दौरान पशुपालन ग्रामीणों और युवाओं  के लिए मजबूत सहारा बनकर उभरा. ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2020-21 के बाद अब तक बिहार में करीब 8.12 लाख परिवार बकरी पालन से जुड़े, जबकि 2.24 लाख परिवारों ने पोल्ट्री फार्म को अपनाया. इसके अलावा 1.75 लाख परिवार डेयरी और 751 परिवार मत्स्य पालन से नियमित आमदनी कर रहे हैं. सरकार ने मनरेगा के तहत पशुपालकों के लिए शेड निर्माण और पोल्ट्री फार्म  के विकास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इससे खासकर गरीब और एससी-एसटी वर्ग के लोगों को बिना बड़े जोखिम के रोजगार का मौका मिला.

महिलाओं की भागीदारी से बदली गांव की ताकत

इस बदलाव की सबसे खास बात यह है कि इसमें महिलाओं  की भूमिका लगातार बढ़ रही है. स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब बकरी पालन, मुर्गी पालन  और डेयरी के जरिए अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं. विभागीय अधिकारियों के अनुसार, पशुपालन से जुड़े परिवार हर महीने 8 से 10 हजार रुपये की स्थायी आमदनी आसानी से कर रहे हैं. इससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे फैसलों में भी आगे आने लगी हैं. गांवों की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक तस्वीर भी मजबूत हो रही है.

आसान लोन और सरल प्रक्रिया ने बढ़ाया हौसला

सरकार ने पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए लोन की प्रक्रिया भी आसान कर दी है. समूह से जुड़े लाभुकों को बैंकों से कम ब्याज पर ऋण मिल रहा है. आवेदन ग्राम सभा या पूरक ग्राम सभा के माध्यम से किया जाता है, जिसमें गरीब परिवारों और एससी-एसटी वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है. आवेदन मंजूर होने पर लाभुक को यूनिक कोड दिया जाता है. इसके बाद शेड का निर्माण कर समूह को सौंपा जाता है और बैंक से लोन दिलाया जाता है, जिसे आसान किस्तों में चुकाना होता है. ग्रामीण विकास सह परिवहन मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार, पशुपालन गांवों  के विकास का मजबूत स्तंभ बन चुका है. इससे आय बढ़ी है, रोजगार पैदा हुआ है और गांवों में नई उम्मीद जगी है. साफ है कि बिहार के गांव अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहे. पशुपालन ने ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाया है और आने वाले समय में यही गांवों की सबसे बड़ी सफलता की कहानी बनने वाला है.

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Published: 6 Jan, 2026 | 08:28 PM

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