Animal Care Tips : जैसे ही मौसम बदलता है, वैसे ही दुधारू पशुओं की सेहत पर उसका असर साफ दिखने लगता है. खासकर तब, जब पशुपालक रोज हरा चारा नहीं खिला पाते. कई गांवों में यह आम समस्या है कि कभी चारे की कमी हो जाती है, तो कभी महंगाई की वजह से हरा चारा लाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में गाय-भैंस का दूध कम होने लगता है और पशुपालकों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है. लेकिन अगर सही आहार और देखभाल का तरीका अपनाया जाए, तो बिना रोज हरा चारा दिए भी दूध उत्पादन को बनाए रखा जा सकता है.
हरा चारा न मिले, तो संतुलित आहार है सबसे बड़ा सहारा
हरा और ताजा चारा दुधारू पशुओं के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, लेकिन हर समय इसकी उपलब्धता जरूरी नहीं होती. ऐसे हालात में पशुओं को उनकी क्षमता के अनुसार संतुलित आहार देना बेहद जरूरी हो जाता है. सही मात्रा में दाना और सूखा चारा मिलने से पशु कमजोर नहीं पड़ता और उसका दूध भी कम नहीं होता. संतुलित आहार से पशु को जरूरी ऊर्जा मिलती है, जिससे वह मौसम की मार को आसानी से झेल पाता है.
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दूध के अनुसार दें दाना, तभी मिलेगा पूरा फायदा
दूध उत्पादन बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है दाने की सही मात्रा तय करना. अगर भैंस से एक लीटर दूध चाहिए, तो करीब आधा किलो दाना देना फायदेमंद रहता है. वहीं गाय के लिए एक लीटर दूध पर लगभग 400 ग्राम दाना पर्याप्त होता है. ठंड के मौसम में पशु के शरीर को गर्म रखने और ताकत देने के लिए रोजाना करीब एक किलो सूखा दाना अतिरिक्त देना चाहिए. इससे पशु को ऊर्जा मिलती है और दूध की मात्रा में भी सुधार होता है. अगर कभी हरा चारा मिल जाए, तो दाने की मात्रा में थोड़ी कमी की जा सकती है.
कैल्सियम और मिनरल सेहत के लिए जरूरी
जो पशु रोजाना ज्यादा दूध देते हैं, उनमें कैल्सियम और मिनरल की जरूरत भी ज्यादा होती है. अगर यह कमी पूरी न हो, तो दूध धीरे-धीरे कम होने लगता है और पशु कमजोर भी पड़ सकता है. ऐसे पशुओं को रोज कैल्सियम तरल रूप में देना फायदेमंद माना जाता है. इसके साथ ही मिनरल मिक्सचर भी जरूरी होता है, जिसमें शरीर के लिए जरूरी खनिज तत्व होते हैं. इससे हड्डियां मजबूत रहती हैं, शरीर में चमक आती है और बार-बार बीमार पड़ने की समस्या कम होती है.
सही देखभाल से बढ़ेगी दूध की बाल्टी और आमदनी
अगर पशुओं को समय पर सही आहार, कैल्सियम-मिनरल और साफ-सफाई मिलती रहे, तो बिना हरे चारे के भी अच्छा दूध मिल सकता है. इसके साथ-साथ अब नई तकनीकों के जरिए नस्ल सुधार पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जिससे भविष्य में ज्यादा दूध देने वाले पशु तैयार हो सकें. कुल मिलाकर, थोड़ी सी समझदारी और सही जानकारी अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं. इससे न सिर्फ दूध उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि पशुपालकों की आमदनी भी मजबूत होगी और बाल्टी भर दूध का सपना हकीकत में बदल सकता है.