Poultry Farming: नहीं महंगा दाना और न ही बीमारी की टेंशन, इस देसी मुर्गी से कम लागत में होगी बंपर कमाई

कम पूंजी और कम जोखिम के साथ बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग ग्रामीण इलाकों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. कम जगह, कम खर्च और अच्छी आमदनी इसकी सबसे बड़ी खासियत है. देसी नस्ल की मुर्गियां कम देखभाल में पल जाती हैं और अंडे व चूजों से लगातार कमाई का मौका देती हैं.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 4 Jan, 2026 | 12:14 PM

Poultry Farming : ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग ऐसी कमाई की तलाश में रहते हैं, जिसमें खर्च कम हो और जोखिम भी न के बराबर. महंगे दाने, बढ़ती बीमारियों और बाजार की मार के बीच अगर कोई काम भरोसेमंद बनकर उभरा है, तो वह है बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग. खास बात यह है कि इसमें न बड़ी जमीन चाहिए, न भारी निवेश. सिर्फ घर के आसपास थोड़ी-सी जगह में एक खास देसी नस्ल की मुर्गी पालकर लोग अच्छी आमदनी कर रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नस्ल कम देखभाल में पल जाती है और तेजी से मुनाफा देती है.

बैकयार्ड पोल्ट्री का किंग मानी जाती है यह नस्ल

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वनराजा नस्ल  की मुर्गी को बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग का किंग कहा जाता है. इसे गांव हो या कस्बा, दोनों जगह आसानी से पाला जा सकता है. सिर्फ 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में इसका पालन संभव है. सबसे अच्छी बात यह है कि एक मुर्गी साल में करीब 100 से 150 अंडे देती है. यही वजह है कि छोटे किसान और ग्रामीण परिवार इसे तेजी से अपना रहे हैं.

सिर्फ 20 मुर्गियों से कर सकते हैं शुरुआत

इस काम की शुरुआत बहुत छोटे स्तर से की जा सकती है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिर्फ 20 मुर्गियों और 2 मुर्गों से बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग  शुरू हो जाती है. ज्यादा शेड, महंगे उपकरण या बड़ी व्यवस्था की जरूरत नहीं होती. घर के आंगन या खाली पड़ी जमीन में ही इनका पालन किया जा सकता है. यही कारण है कि कम पूंजी वाले लोग भी बिना डर के इस काम में उतर रहे हैं.

अंडे और चूजे दोनों से होती है कमाई

अगर केवल मुर्गियां पाली जाएं, तो उनके अंडों का इस्तेमाल घर में या बिक्री के लिए किया जा सकता है. वहीं, मुर्गों के साथ पालन  करने पर अंडों से चूज़े भी निकलते हैं. इन चूज़ों की गांवों में अच्छी मांग रहती है. लोग इन्हें बेचकर अलग से कमाई कर लेते हैं. इस तरह एक ही काम से अंडे और चूजे, दोनों से आमदनी के रास्ते खुल जाते हैं.

न बीमारी का डर, न दाने का खर्च

वनराजा मुर्गी  की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता  है. यह किसी भी मौसम में आसानी से सर्वाइव कर लेती है और कम बीमार पड़ती है. खास बात यह है कि इन्हें पालने के लिए अलग से दाना खरीदने की जरूरत नहीं होती. खुले में घूमकर ये अपना भोजन खुद ढूंढ लेती हैं. किचन का बचा हुआ खाना, अनाज, सब्जियों के छिलके, बची रोटी और भात इन्हें दिया जा सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मुर्गियां करीब 30 दिनों में आधा से एक किलो तक वजन भी पकड़ लेती हैं. कम खर्च, कम मेहनत और लगातार आमदनी-यही वजह है कि बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग आज ग्रामीण भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही है.

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