Poultry Farming: कभी 5 रुपये की दिहाड़ी पर काम करने वाला एक साधारण सा युवक, आज हजारों मुर्गियों का मालिक बनकर करोड़ों का सफल कारोबार चला रहा है. यह कहानी है महाराष्ट्र के अमरावती के रहने वाले रविंद्र माणिकराव मेटकर की, जिन्होंने संघर्ष भरे दिनों से निकलकर मेहनत, धैर्य और लगातार सीखने की आदत के दम पर अपनी पहचान बनाई. कम उम्र में ही जिम्मेदारियां उठाने वाले रविंद्र ने हार नहीं मानी और हर चुनौती को मौके में बदला. नई तकनीक अपनाकर और समय के साथ खुद को बदलते हुए उन्होंने अपने छोटे से काम को एक बड़े व्यवसाय में बदल दिया, जो आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है.
मेटकर ने बताया कि अपनी इस सफलता की कहानी को ऑक्सफोर्ड जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर साझा करने का मौका मिलना उनके लिए किसी सम्मान से कम नहीं है. उनका मानना है कि यह उपलब्धि न सिर्फ उनकी मेहनत का परिणाम है, बल्कि देश के किसानों के लिए भी गर्व की बात है.
छोटे से शुरूआत, बड़ा बना कारोबार
रविंद्र मेटकर ने साल 1984 में सिर्फ 100 मुर्गियों से अपना पोल्ट्री व्यवसाय शुरू किया था. उस समय उनकी उम्र महज 16 साल थी और हालात बेहद सामान्य थे. परिवार की जिम्मेदारी और सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने अपने काम को बढ़ाया और अनुभव के साथ नई-नई चीजें सीखते गए. आज उनके पास 1,80,000 लेयर मुर्गियां हैं, जो रोज करीब 1,20,000 अंडे देती हैं. यही नहीं, एक एकड़ जमीन से शुरू हुआ उनका सफर अब 50 एकड़ तक पहुंच चुका है.

रविंद्र माणिकराव मेटकर.
मेहनत और तकनीक से मिली पहचान
रविंद्र मेटकर सिर्फ मेहनत तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने समय के साथ नई तकनीकों को अपनाया. वे लगातार एक्सपो और कृषि मेलों में जाते हैं, जहां से नई जानकारी लेकर अपने फार्म में इस्तेमाल करते हैं. इसी लगन और कामयाबी के चलते उन्हें ICAR का सम्मान भी मिल चुका है. उनका मानना है कि अगर किसान नई तकनीक अपनाए और सीखना बंद न करे, तो वह किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है. उनका मातोश्री पोल्ट्री फार्म और मातोश्री कृषि फार्म आज एक सफल मॉडल बन चुका है, जहां पोल्ट्री के साथ-साथ ऑर्गेनिक खेती भी की जा रही है.
रोजगार का बड़ा जरिया बना फार्म
रविंद्र मेटकर का यह सफर सिर्फ उनकी अपनी सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने कई लोगों की जिंदगी भी बदली है. आज उनके फार्म पर करीब 50 लोगों को रोजगार मिल रहा है. एक समय खुद मजदूरी करने वाले रविंद्र आज दूसरों को काम देने वाले बन चुके हैं. उनका कहना है कि पोल्ट्री व्यवसाय ने न सिर्फ उनकी जिंदगी बदली, बल्कि गांव के कई परिवारों को भी सहारा दिया है. आज उनका सालाना टर्नओवर करीब 15 करोड़ रुपये है, जो यह दिखाता है कि सही दिशा में मेहनत करने से गांव में रहकर भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है.
किसानों के लिए जरूरी है सही सपोर्ट
रविंद्र मेटकर ने पोल्ट्री सेक्टर की एक बड़ी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया. उनका कहना है कि कंपनियां तो तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन किसान उसी रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पा रहे. कई किसान पोल्ट्री में आते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन और सपोर्ट की कमी के कारण जल्दी ही यह काम छोड़ देते हैं. उनका मानना है कि कंपनियों को किसानों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, ताकि दोनों का विकास हो सके. वे कहते हैं कि अगर किसानों को सही जानकारी, ट्रेनिंग और सहयोग मिले, तो वे लंबे समय तक इस व्यवसाय में टिक सकते हैं और अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.