वैज्ञानिकों ने जताई चिंता, घट सकती है गेहूं, सरसों, मसूर की पैदावार.. सेब की क्वालिटी पर भी पड़ेगा असर

उत्तराखंड के मसूरी और हरसिल क्षेत्रों में सर्दियों की बारिश व बर्फबारी न होने से सेब की फसल संकट में है. ठंड की कमी से पेड़ों का प्राकृतिक चक्र बिगड़ रहा है, जिससे पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं. सूखे मौसम का असर गेहूं, मसूर और सरसों की खेती पर भी दिख रहा है.

Kisan India
नोएडा | Published: 16 Jan, 2026 | 07:01 PM

Uttarakhand News: उत्तराखंड के मसूरी में इस बार सर्दियों की बारिश और बर्फबारी न होने से सेब की फसल पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है. अधिकारियों के मुताबिक, ऊंचाई वाले इलाकों में सेब उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है. धनोल्टी एप्पल बेल्ट के बागवानी प्रभारी भरत सिंह कठैत ने कहा कि सेब के पेड़ों को अपनी प्राकृतिक नींद (डॉर्मेंसी) पूरी करने के लिए 0 से 7 डिग्री सेल्सियस तापमान में करीब 1,000 से 1,500 घंटे की ठंड जरूरी होती है. लेकिन बर्फ न गिरने से जमीन का तापमान सामान्य से ज्यादा बना हुआ है, जिससे पेड़ों का प्राकृतिक चक्र बिगड़ रहा है. इसका असर फूल कम आने, फल सही तरह से न बनने, सेब का आकार छोटा रहने और रंग फीका होने के रूप में दिख सकता है, जिससे बाजार कीमत घटेगी. वहीं, मसूर, गेहूं और सरसों की फसलों को भारी नुकसान हुआ है. इससे पैदावार घट सकती है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच सालों से दिसंबर महीने में बारिश बेहद कम  रही है. इस दौरान सिर्फ एक साल सामान्य या उससे ज्यादा बारिश दर्ज हुई. मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच तो बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई. देहरादून मौसम केंद्र के निदेशक सी.एस. तोमर ने कहा कि कमजोर या कम सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ इसकी मुख्य वजह हैं, जो आमतौर पर हिमालय क्षेत्र में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी लाते हैं. वहीं, कृषि और बागवानी मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि शुरुआती आकलन में बारिश न होने की वजह से करीब 15 प्रतिशत मौसमी फसल प्रभावित हुई है.

फूल कम आएंगे और पैदावार काफी घट जाएगी

उत्तरकाशी जिले के हरसिल क्षेत्र, जो सेब उत्पादन के लिए जाना जाता है, वहां के किसान बदलते मौसम को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं. किसानों का कहना है कि अगर जल्द ही मौसम में सुधार नहीं हुआ तो सेब की पैदावार में भारी गिरावट  आ सकती है. धाराली गांव के ग्रामीण, जो पिछले साल अगस्त में आई अचानक बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित हुए थे, नुकसान की भरपाई के लिए सेब की फसल पर निर्भर थे. ग्राम प्रधान अजय नेगी ने कहा कि नवंबर, दिसंबर और अब जनवरी तक बारिश या बर्फबारी न होने से हालात बेहद खराब हैं. अगर जल्द बर्फ नहीं गिरी तो सेब में फूल कम आएंगे और पैदावार काफी घट जाएगी.

गेहूं और मसूर का अंकुरण और बढ़वार कमजोर

वहीं, सूखे मौसम का असर चमोली जिले में भी दिख रहा है. वहां मसूर, गेहूं और सरसों की फसलों को भारी नुकसान हुआ है और नमी की कमी व पाले के असर से सेब की खेती भी दबाव में है. नवंबर से लगातार सूखे मौसम के कारण बारिश पर निर्भर गेहूं और मसूर  जैसी फसलों का अंकुरण और बढ़वार कमजोर रही है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई तो जमीन की गहरी नमी कम हो जाएगी. इससे गर्मियों में पेड़ों में पानी की कमी, समय से पहले फल गिरने और कीट-रोग बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

टिहरी जिले के खाद्य प्रसंस्करण विभाग की वरिष्ठ वैज्ञानिक कृतिका कुमारी ने कहा कि गेहूं और मसूर का उत्पादन घटने से स्थानीय सप्लाई चेन प्रभावित होगी और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े स्वयं सहायता समूहों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा. कृषि मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि अधिकारियों को तुरंत पूरे राज्य में सर्वे कराने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि फसल नुकसान का आकलन कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा सके और प्रभावित किसानों के लिए उचित राहत योजना बनाई जा सके.

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