भारत कृषि और खाद्य निर्यात बढ़ाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है, लेकिन वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन से नहीं बल्कि मजबूत कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर से तय होती है. इसी बीच अमेरिका के कृषि विभाग (USDA) ने खाद्य सहायता संस्थाओं के लिए 7.5 मिलियन डॉलर (करीब 71.74 करोड़ रुपये) की ग्रांट का ऐलान किया है. दूसरी ओर भारत में भी 1,000 से 5,000 मीट्रिक टन क्षमता वाले कोल्ड स्टोरेज पर करोड़ों रुपये का निवेश और 35-50 फीसदी तक सरकारी सब्सिडी उपलब्ध है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को विदेशी बाजारों में मजबूती से मुकाबला करना है तो कोल्ड चेन उपकरण और आधुनिक भंडारण क्षमता का तेजी से विस्तार करना होगा.
USDA ने खोला 7.5 मिलियन डॉलर का ग्रांट फंड
USDA ने Cold Chain Grants for Emergency Food Assistance Program (CCG) के तहत 7.5 मिलियन डॉलर की फंडिंग घोषित की है. यह राशि गैर-लाभकारी संस्थाओं को ताजे, फ्रोजन और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सुरक्षित भंडारण, पैकेजिंग और वितरण के लिए दी जाएगी. इस योजना के तहत योग्य संस्थाएं 1 अक्टूबर 2026 तक इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आवेदन कर सकती हैं. प्रत्येक परियोजना को उप-अनुदान के जरिए अधिकतम 2 लाख डॉलर तक की सहायता मिल सकती है, जिसका उपयोग रेफ्रिजरेशन उपकरण, कोल्ड स्टोरेज यूनिट, इंस्टॉलेशन और आवश्यक सहायक सामग्री खरीदने में होगा.
भारत में कितनी है कोल्ड स्टोरेज की लागत?
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अनुसार, भारत में कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की लागत उसकी क्षमता पर निर्भर करती है. लगभग 1,000 MT क्षमता वाले प्लांट पर 1.4 रुपये से 1.8 करोड़ रुपये तक का निवेश आता है, जिसमें 60-7 फीसदी खर्च रेफ्रिजरेशन मशीनरी और इंसुलेशन उपकरणों पर होता है. वहीं 5,000 MT क्षमता वाले आधुनिक कोल्ड स्टोरेज की लागत 5 से 8 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. इस प्रकार के प्रोजेक्ट में इलेक्ट्रिकल सिस्टम, ऑटोमेशन, तापमान नियंत्रण और ऊर्जा दक्ष उपकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के माध्यम से ऐसे प्रोजेक्ट पर 35 फीसदी से 50 फीसदी तक सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जाती है.
क्यों जरूरी है मजबूत कोल्ड चेन नेटवर्क?
भारत दुनिया के सबसे बड़े फल, सब्जी, डेयरी और कृषि उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन कटाई के बाद खराब होने वाली उपज अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. पर्याप्त कोल्ड चेन न होने से किसानों को कीमत का नुकसान होता है और निर्यात योग्य गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और वैज्ञानिक पैकेजिंग से उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ती है, गुणवत्ता बनी रहती है और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की मांग के अनुरूप सप्लाई संभव हो पाती है.
विदेशी बाजार में मुकाबले के लिए क्या करना होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका जैसे देश केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पूरी कोल्ड चेन प्रणाली में निवेश कर रहे हैं. भारत के पास भी सब्सिडी और सरकारी योजनाओं का मजबूत आधार है, लेकिन जरूरत है निजी निवेश, आधुनिक उपकरण और ग्रामीण स्तर तक कोल्ड चेन नेटवर्क के विस्तार की. यदि उत्पादन, भंडारण और लॉजिस्टिक्स को एक साथ मजबूत किया जाए तो भारतीय कृषि उत्पाद विदेशी बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं. यही निवेश किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ भारत के खाद्य निर्यात को भी नई ऊंचाई दे सकता है.