Jagannath Rath Yatra: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा शुरू हो चुकी है और पुरी समेत पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह का माहौल है. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर के लिए रवाना होते हैं. इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत केवल विशाल रथ नहीं, बल्कि भगवान को अर्पित होने वाला महाप्रसाद भी है. श्री जगन्नाथ मंदिर के छप्पन भोग में अरवा चावल, गेहूं, चावल का आटा, मूंग, अरहर और उड़द जैसी पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया जाता है, जबकि आलू, टमाटर और गोभी जैसी तीन सब्जियां पूरी तरह वर्जित हैं. सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जा रही है.
रथ यात्रा का कार्यक्रम और मौसी के घर जाने की परंपरा
इस वर्ष 16 जुलाई 2026 यानी आज भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ. इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं, जिसे श्रद्धालु भगवान का मौसी के घर जाना भी कहते हैं. तीनों देवता वहां नौ दिनों तक विराजमान रहते हैं. इसके बाद 24 जुलाई को बाहुदा यात्रा के जरिए भगवान वापस श्रीमंदिर लौटेंगे, जबकि 25 जुलाई को सुनावेश होगा. इस दिन भगवान का स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि गुंडीचा मंदिर में भगवान के आड़प दर्शन करने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है और रथ यात्रा में तीन कदम चलना भी मोक्षदायक माना गया है.
महाप्रसाद में क्यों खास है अरवा चावल
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद, जिसे अबाधा भी कहा जाता है, पूरी तरह सात्विक और पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण स्थान अरवा चावल का होता है, जिससे भात, कनिका और खिचड़ी बनाई जाती है. इसके अलावा गेहूं और चावल के आटे से काकरा, मंडा और मालपुआ जैसे पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं. दालों में मुख्य रूप से मूंग, अरहर और उड़द का उपयोग किया जाता है. मिठास के लिए चीनी की जगह गुड़ और खांड का प्रयोग किया जाता है, जबकि शुद्ध देसी घी, नारियल और पारंपरिक सात्विक मसाले व्यंजनों का स्वाद बढ़ाते हैं. सब्जियों में कद्दू, केला, अरबी और कटहल का उपयोग किया जाता है, लेकिन आलू, टमाटर और गोभी को महाप्रसाद में शामिल नहीं किया जाता क्योंकि इन्हें पारंपरिक भारतीय खाद्य सामग्री का हिस्सा नहीं माना गया है.
भगवान को छह बार लगता है भोग, हर भोग का है अलग महत्व
श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को प्रतिदिन 6 बार भोग अर्पित किया जाता है, जिसे भोग नीति कहा जाता है. दिन की शुरुआत गोपाल बल्लभ भोग से होती है, जिसे भगवान का नाश्ता माना जाता है. इसके बाद सकाल धूप, दोपहर में भोग मंडप या राजभोग, फिर मध्याह्न धूप, शाम को संध्या धूप और रात में बड़ा सिंगार या शयन भोग अर्पित किया जाता है. प्रत्येक भोग तय समय और परंपरा के अनुसार बनाया जाता है. इसके बाद यही प्रसाद महाप्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है. यह परंपरा सदियों से बिना किसी बदलाव के आज भी निभाई जा रही है और इसे जगन्नाथ संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है.
बिना लोहे की कील के बनता है भगवान का अद्भुत रथ
जगन्नाथ रथ यात्रा का एक और अनोखा आकर्षण भगवान के विशाल रथ हैं, जो भारतीय शिल्पकला और पारंपरिक इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण माने जाते हैं. इन रथों के निर्माण में 4000 से अधिक लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है, लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि पूरे रथ में एक भी लोहे की कील या धातु का इस्तेमाल नहीं होता. पूरा ढांचा लकड़ी के जोड़ और पारंपरिक तकनीक से तैयार किया जाता है. इस कला को कारीगर परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी आधुनिक नक्शे के आगे बढ़ा रहे हैं. यही वजह है कि जगन्नाथ रथ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन संस्कृति, परंपरा, वास्तुकला और शिल्प कौशल का जीवंत प्रतीक भी मानी जाती है.