Wheat Farming : जनवरी की कड़ाके की ठंड में जब खेतों में हाथ डालना भी मुश्किल हो जाता है, तब कई किसान गेहूं की बुवाई को लेकर असमंजस में रहते हैं. देर हो चुकी होती है, तापमान नीचे चला जाता है और बीज के जमाव की चिंता सताने लगती है. लेकिन खेती के जानकारों के मुताबिक, अगर इस मौसम में सही गणित अपनाया जाए, तो यही देरी मुनाफे का मौका बन सकती है. जनवरी में गेहूं बोने वालों के लिए 25 फीसदी फॉर्मूला इस समय सबसे कारगर उपाय माना जा रहा है.
ठंड में कमजोर जमाव की समस्या, बीज बढ़ाकर करें भरपाई
जनवरी में तापमान अक्सर गेहूं के अनुकूल स्तर से नीचे चला जाता है. ठंड के कारण बीज ठीक से अंकुरित नहीं हो पाते और खेत में पौधों की संख्या कम रह जाती है. इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है. इसी समस्या से बचने के लिए कृषि विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि किसान बीज की मात्रा सामान्य से करीब 25 फीसदी तक बढ़ा दें. ज्यादा बीज डालने से भले ही कुछ दाने न जम पाएं, लेकिन खेत में पौधों की संख्या संतुलित बनी रहती है और आगे चलकर फसल कमजोर नहीं पड़ती.
देरी से बुवाई में खाद कम, ज्यादा डालना बन सकता है नुकसान
पछेती बुवाई वाली गेहूं की फसल को बढ़ने के लिए समय कम मिलता है. ऐसे में पौधे ज्यादा खाद को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाते. जानकारों के अनुसार, जनवरी में बुवाई करने पर रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में करीब 25 फीसदी की कटौती कर देनी चाहिए. ज्यादा खाद डालने से न तो फसल को फायदा होता है और न ही उत्पादन बढ़ता है. उल्टा, यह किसानों के पैसे की बर्बादी साबित हो सकता है. संतुलित खाद देने से फसल की बढ़वार बेहतर रहती है.
लागत और मुनाफे का संतुलन, जेब पर नहीं पड़ता बोझ
इस तकनीक में भले ही बीज पर थोड़ा ज्यादा खर्च आता है, लेकिन खाद की कटौती से वही पैसा बच भी जाता है. यानी खेती की कुल लागत लगभग बराबर रहती है. बीज और खाद के इस संतुलन से फसल का प्रबंधन आसान हो जाता है. सही समय पर सिंचाई और पोषक तत्व देने से पौधों की ग्रोथ अच्छी होती है और बालियां भरपूर निकलती हैं. इससे किसानों को नुकसान की जगह बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना बढ़ जाती है.
सही रणनीति से जनवरी की चुनौती बनेगी मौका
खेती से जुड़े जानकार मानते हैं कि जनवरी में गेहूं की बुवाई चुनौती जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं. अगर किसान बीज और खाद का सही हिसाब समझ लें, तो कम समय में भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है. ठंड के बावजूद यह 25 फीसदी का फॉर्मूला किसानों को आर्थिक नुकसान से बचा सकता है. थोड़ी समझदारी और सही तकनीक अपनाकर जनवरी की देरी को भी फायदे में बदला जा सकता है.