गेहूं की अगेती किस्म की बुवाई के लिए सलाह, वैज्ञानिकों ने बताया कितनी खाद डालें तो बढ़ेगी पैदावार

Wheat Farming Tips: हिसार के चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की अगेती बुवाई और सिंचाई के लिए जरूरी सलाह जारी की है. किसानों को बताया गया है कि किस समय बुवाई करें, कौन-सी किस्म चुनें और कितनी खाद डालने से फसल की पैदावार बेहतर होगी.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 7 Nov, 2025 | 03:44 PM

Wheat Farming : देश के किसानों के लिए एक बड़ी जानकारी सामने आई है. कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की अगेती किस्मों और सामान्य किस्मों की बुवाई को लेकर नई एडवाइजरी जारी की है. इसमें बताया गया है कि कौन सी किस्म की कब बुवाई करनी चाहिए, कितनी खाद डालनी है, और कब करनी है सिंचाई. इन सुझावों को अपनाकर किसान गेहूं की पैदावार में 20 से 25 फीसदी तक इजाफा हासिल कर सकते हैं.

गेहूं की बुवाई का सही समय

चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार हरियाणा द्वारा गेहूं की अगेती और सामान्य बुवाई हेतु उपयुक्त बीज प्रजाति , बुवाई समय, सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन के संबंध में सूचना जारी की है. अगेती बुवाई का सबसे सही समय 25 अक्टूबर से 5 नवंबर तक है. जबकि सामान्य बुवाई के लिए 1 नवंबर से 25 नवंबर का समय उपयुक्त माना गया है. समय से की गई बुवाई न सिर्फ अच्छी अंकुरण दर देती है, बल्कि पौधों को ठंड के मौसम में मजबूती से बढ़ने में मदद करती है.

देर से बुवाई करने पर उत्पादन में कमी देखी जाती है. बिजाई के लिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे उर्वरक ड्रिल मशीन का उपयोग करें. बीज की गहराई लगभग 5 सेंटीमीटर और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.

कौन-सी किस्में देंगी ज्यादा उत्पादन

विशेषज्ञों ने बताया है कि हर मौसम और सिंचाई  की स्थिति के हिसाब से सही किस्म का चयन करना जरूरी है.

  1. अगेती बुवाई, सीमित सिंचाई और कम खाद वाली किस्में: WH 1402, WH 1142, WH 1080, PBW 644, NIAW 3170, DBW 296, HI 1653, HD 3369
  2. अगेती बुवाई, सिंचित और अधिक खाद वाली किस्में:WH 1270, DBW 187, DBW 303, DBW 327, DBW 371, DBW 372, PBW 872
  3. सामान्य बुवाई के लिए उपयुक्त किस्में: WH 1105, WH 1184, DBW 222, HD 3086, PBW 826, HD 3386

कृषि विशेषज्ञों ने कहा है कि 40 किलो बीज प्रति एकड़ बुवाई के लिए पर्याप्त होता है. अधिक बीज डालने से पौधों का घनत्व बढ़ता है, जिससे उपज पर असर पड़ता है.

बीज उपचार और रोग से बचाव के उपाय

बीज को बोने से पहले उसका उपचार बहुत जरूरी है. इससे दीमक और फफूंद  जैसी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है.

  • दीमक से बचाव: 60 मि.ली. क्लोरपायरीफास 20 EC या 200 मि.ली. ईथियोन 50 EC को 2 लीटर पानी में मिलाकर 40 किलो बीज पर छिड़कें.
  • फफूंद से बचाव: 2 ग्राम वीटावैक्स या बाविस्टिन या 1 ग्राम टेबुकोनाजोल (रक्सिल 2 DC) प्रति किलो बीज सूखा उपचार करें.
  • जैविक उपचार: 200 मि.ली. एजोटोबैक्टर और 200 मि.ली. फॉस्फोरस टीका (PSB) 40 किलो बीज के लिए मिलाकर इस्तेमाल करें.

उर्वरक का सही संतुलन

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि खेत में अधिक या कम उर्वरक डालने  से पैदावार प्रभावित होती है. इसलिए संतुलित मात्रा का उपयोग जरूरी है.

अगेती बुवाई (अधिक सिंचाई व खाद वाली किस्मों के लिए):प्रति एकड़ 90 किग्रा नाइट्रोजन, 36 किग्रा फास्फोरस और 24 किग्रा पोटाश दें. इसके लिए 75 किग्रा DAP, 165 किग्रा यूरिया और 30 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रयोग करें.

सामान्य बुवाई (सिंचित दशा में):60 किग्रा नाइट्रोजन, 24 किग्रा फास्फोरस और 12 किग्रा पोटाश प्रति एकड़ डालें. इसके लिए 50 किग्रा DAP, 110130 किग्रा यूरिया और 20-25 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटाश पर्याप्त है. वैज्ञानिकों ने बताया कि खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच करवाना जरूरी है. इससे पता चलता है कि मिट्टी में कौन-से पोषक तत्वों की कमी है.

सिंचाई कब और कैसे करें

पहली सिंचाई  बुवाई के 20-25 दिन बाद करनी चाहिए. यह समय शिखर जड़ निकलने का होता है और पौधे को सबसे अधिक नमी की जरूरत होती है.

  • दूसरी सिंचाई- बाल निकलने की अवस्था में
  • तीसरी सिंचाई- फूल आने के समय
  • चौथी सिंचाई- दाने भरने के समय

सिंचाई के समय ध्यान रखें कि खेत में पानी जमा न हो, वरना पौधों की जड़ों में सड़न हो सकती है.

मोल्या रोग से बचाव के लिए सलाह

जिन खेतों में पहले सरसों, चना, मेथी या सब्जियों की फसल ली गई है, वहां मोल्या रोग का खतरा रहता है. ऐसे खेतों में गेहूं की बुवाई 15 नवंबर से पहले पूरी कर लें. अगर खेत में संक्रमण ज्यादा है तो कार्बोफ्यूरान 3जी (13 किलो प्रति एकड़) बुवाई के समय डालें. बीज को एजोटोबेक्टर क्रोकोम या एजोटीका से उपचारित करने से भी यह रोग नियंत्रित रहता है.

किसानों के लिए मुख्य सुझाव

  • गेहूं की बुवाई से पहले मिट्टी परीक्षण जरूर कराएं.
  • बीज उपचार और फसल चक्र अपनाएं.
  • सिंचाई और खाद की मात्रा संतुलित रखें.
  • फसल की नियमित निगरानी करें ताकि रोग जल्दी पहचान में आए.
  • कृषि विभाग की एडवाइजरी का पालन करें, जिससे लागत घटे और मुनाफा बढ़े.

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Published: 7 Nov, 2025 | 03:39 PM
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